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सुजिनी कशीदाकारी

ग्रामीण महिलाओं ने सुजिनी कशीदाकारी को विश्व के मानचित्र पर स्थापित किया

बिहार की महिला शिल्पकारों ने कभी स्थानीय उपयोग के लिए तैयार की जाने वाली पारंपरिक कशीदाकारी सुजिनी को, आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप ढाल कर एक अंतरराष्ट्रीय आकर्षण प्रदान किया है।

सुजिनी कशीदाकारी, एक पारंपरिक शिल्प, एक ओर सरफुद्दीनपुर की गुडिया देवी जैसी महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने में मदद कर रही है, वहीं ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान कर रही है (छायाकार- मोहम्मद इमरान खान)

चन्द्राणी चौधरी और उनकी युवा बेटी तनुश्री, मध्य-अक्टूबर की दोपहर में एक चटख लाल रंग के दुपट्टे पर, हाथ से किये कशीदे को अंतिम रूप देने में व्यस्त थी| वे रविवार और त्यौहार के दिनों में भी काम कर रही थी, क्योंकि उन्हें विदेश से मिले कई ऑर्डर समय पर पूरे करने थे।

वे उन लगभग 40 महिलाओं और लड़कियों में शामिल हैं, जो मुजफ्फरपुर जिले के हरे-भरे धान के खेतों और लीची के बागों से घिरे गांव, सरफुद्दीनपुर में कपड़े पर सुजिनी कशीदाकारी करने वाली समर्पित कारीगर हैं।

उनकी कड़ी मेहनत ने, अब तक बिहार के एक छोटे से ग्रामीण क्षेत्र में सीमित इस अनजानी सी कशीदाकारी को, हाल के वर्षों में देश और विदेश में एक अनूठी कलाकृति के रूप में पहचान दिलाई है, जिससे उन्हें वित्तीय स्वतंत्रता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली।

पारंपरिक शिल्प

परंपरागत रूप से ग्रामीण महिलाएं अपने खाली समय में तकिया कवर, संदूक कवर और सूती बैग, जैसी घर की वस्तुओं को सजाने के लिए सुजिनी कशीदाकारी करती थी। कुछ घरों में महिलाएं सुजिनी से वाल-हैंगिंग जैसी सजावटी वस्तुएं बनाती थी, लेकिन सबकुछ अपने स्वयं के उपयोग के लिए।

आयु के पांचवें दशक के मध्य में चल रही एक कारीगर, रेणु चौधरी अपने बचपन के दिनों को याद करती हैं, जब उनकी मां, दादी और उनके पड़ोस की दूसरी महिलाएं नए पुराने कपड़ों, चादरों, पर्दों, और सूती-बैग (स्थानीय भाषा में थैला) पर मोर, शेर, बाघ और मछली की कढ़ाई करती थीं।

रेणु चौधरी ने बताया कि इस पारंपरिक शिल्प ने सरफुद्दीनपुर और मुजफ्फरपुर के कई अन्य गांवों की महिलाओं का जीवन बदल दिया है। उनके अनुसार, ग्रामीण शिल्प को विलुप्त होने से बचाने में जुटी महिलाओं के एक समूह के प्रयासों के कारण, यह कुछ साल पहले एक तरह का पेशा बन गई।

चौथे दशक के मध्य आयु की सुजिनी कारीगर, गुड़िया देवी ने VillageSquare.in को बताया – “पहले हम घर में बेकार रहते थे, लेकिन अब नहीं| सुजिनी ने हमें काम, पैसा, नाम और अपनी कला के माध्यम से अभिव्यक्ति के लिए गोवा, मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु जाने का अवसर प्रदान किया है।”

सुजिनी का पुनरुत्थान

चन्द्राणी चौधरी और गुड़िया देवी ने बताया कि वे 2007 से सुजिनी कशीदाकारी का काम कर रही हैं, लेकिन तीन साल पहले इसे तब प्रोत्साहन मिला, जब दिल्ली स्थित ‘हेरिटेज फाउंडेशन ऑफ इंडिया’ ने उन्हें कला को आगे बढ़ाने में मदद की।

चंद्रानी चौधरी जैसी कारीगर सुजिनी कलाकृति बनाने में गर्व महसूस करती हैं, जिसकी स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी मांग है (छायाकार-मोहम्मद इमरान खान)

उन्होंने बताया कि सबसे पहले बिहार की ग्रामीण आजीविका परियोजना, “जीविका” ने एक दशक पहले सुजिनी कारीगरों को सहायता प्रदान की थी, जिससे उन्हें काम मिला। चन्द्राणी ने कहा, ”जब ‘एशियन हेरिटेज फाउंडेशन’ ने हमारे साथ हाथ मिलाया तो हमें दिल्ली और विदेशी ग्राहकों से ऑर्डर मिलने लगे।”

सुजिनी को युवाओं के बीच लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से पेशेवर डिजाइनर, अलग-अलग रंगों के मेल से, अधिक आकर्षक डिज़ाइन तैयार करने के लिए कारीगरों को प्रशिक्षण प्रदान करते हैं।

कारीगर महिलाएं केवल महिलाओं के साड़ी, सलवार और स्कार्फ जैसे कपड़ों और सामान पर ही नहीं, बल्कि पुरुषों के कुर्तों और टी-शर्ट पर भी कलात्मक कारीगरी करती हैं। वे बिस्तर की चादर और मोबाइल फोन एवं टेलीविज़न के कवर सहित, घरेलू साजो-सामान पर भी कशीदाकारी करती हैं।

वित्तीय स्वावलम्बन

गुडि़या देवी, जो अपने गांव में सुजिनी कारीगरों की समन्वयक भी हैं, ने बताया कि वे अब पैसे के लिए अपने पति पर निर्भर नहीं हैं। वह कहती हैं – “हम जो कमाते हैं वह हमारा अपना पैसा है और हम अब असहाय नहीं हैं| अब हम आसानी से अपने सपनों को पूरा कर सकते हैं।”

चन्द्राणी चौधरी, जिनकी आयु पचास वर्ष के करीब है, कहती हैं कि सुजिनी ने उन्हें गरीबी से बाहर निकलने और अपनी स्वयं की पहचान हासिल करने में मदद की है। उन्होंने VillageSquare.in को बताया,”एक दशक पहले सुजिनी से कमाई कर पाना संभव नहीं था।”

तनुश्री और दीक्षा कुमारी एक पार्ट-टाइम स्नातक कोर्स कर रही हैं, जिसकी कक्षाओं के लिए उन्हें जरूरी लचीलापन प्राप्त होता है। दिन के समय वे परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों और पड़ोसियों के एक समूह के साथ कशीदाकारी करती हैं और रात के समय पढाई| दीक्षा कुमारी ने बताया, “हम अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए काफी कमा लेते हैं, यदि बचत हो जाए तो हम कपड़े और गहनों पर भी खर्च कर सकते हैं।”

ग्रामीण अर्थव्यवस्था

पांच महिलाओं की एक टीम का नेतृत्व करने वाली सुमन देवी के अनुसार, सुजिनी कशीदाकारी ने महिलाओं को शिल्प के द्वारा कमाई का अवसर प्रदान किया है। “सुजिनी हमें घर से ही काम करने और आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने में मदद करती है,” उन्होंने VillageSquare.in को बताया – “मैं 3000 से 5000 रुपये प्रतिमाह कमाती हूं; यह एक बड़ा परिवर्तन है।”

मुजफ्फरपुर के “जीविका” जिला परियोजना प्रबंधक, संतोष कुमार सोनू ने कहा – “यह ग्रामीण महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण का एक जीवंत उदाहरण है। ये महिलाएं मिलकर सालाना लाखों कमा रही हैं और उन्हें इससे सम्मान और प्रतिष्ठा मिलती है।”

महिलाएं न केवल विभिन्न कपड़ों पर की गई अपनी सुजिनी कशीदाकारी सीधे बाजार में बेच रही हैं, उन्हें स्थानीय दुकानों, शहरों में शोरूम और विभिन्न टेक्सटाइल-मेलों से ऑर्डर भी प्राप्त होते हैं। बुज़ुर्ग ग्रामीणों को जो बात हैरान करती है वह यह कि इन्हें और आरती, प्रेमकला और रीता जैसी अन्य महिलाओं को अब ऑनलाइन ऑर्डर मिल रहे हैं।

दीक्षा कुमारी जैसी पार्ट-टाइम छात्र, जटिल हस्तकला के प्रति आकर्षण के कारण अपने परिवार के सदस्यों के साथ कशीदाकारी करती हैं (छायाकार-मोहम्मद इमरान खान)

सोनू ने VillageSquare.in को बताया, “इन महिलाओं की सुजिनी कशीदाकारी को, लोकप्रिय ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के माध्यम से ऑनलाइन बिक्री के लिए उपलब्ध कराने की हमारी योजना है|”

अंतर्राष्ट्रीय प्रशंसा

हाल ही में अफगानिस्तान की छात्राओं की एक टीम ने, महिलाओं से सुजिनी कशीदाकारी सीखने के लिए सरफुद्दीनपुर गांव का दौरा किया। पिछले कुछ वर्षों में, महिलाओं द्वारा सुजिनी शिल्पकारी करते देखने के लिए विदेशों से कई टीमों ने दौरा किया।

2006 में, सुजिनी को एक “भौगोलिक पहचान” (जीआई) टैग मिला। 2019 में, भुसरा गाँव की सुजिनी कशीदाकारी करने वाली महिला कारीगरों को उनके शिल्प के लिए मान्यता और प्रशंसा के रूप में “यूनेस्को सील ऑफ एक्सीलेंस अवार्ड” मिला।

गुड़िया देवी ने बताया – “क्योंकि भारत के बाहर हमारे काम की मांग है, इसलिए विदेशी लोग हमें काम करते देखने के लिए नियमित रूप से आते हैं। हमारे काम के बारे में सुनकर, विश्व बैंक की एक टीम ने भी हमसे मुलाकात की और वे बहुत प्रभावित हुए।”

समर्पित कारीगर

कपड़े की किस्म, आकार और डिजाइन की जटिलता के आधार पर एक कशीदा पूरा करने में पांच दिन से एक महीने तक का समय लगता है। उर्मिला देवी ने VillageSquare.in को बताया – “इसमें बारीकियों पर ध्यान देने की और उंगलियों की कुशलता की आवश्यकता होती है। महिलाओं को समूह में काम करने, बातचीत करते हुए और गाने सुनते हुए काम करने में आसानी होती है।

सोनू के अनुसार, सरफुद्दीनपुर, भुसरा और मुजफ्फरपुर के कुछ अन्य गांवों की महिला कारीगरों की मेहनत और समर्पण ने अंतरराष्ट्रीय पहचान में बढ़ोत्तरी की है। महिलाएं वर्तमान रुचि का लाभ उठाना चाहती हैं और सुजिनी को एक बड़ा नाम बनाना चाहती हैं, क्योंकि कई लोगों ने उन्हें इस शिल्प को पुनर्जीवित करने में मदद की है।

गुडिआ देवी ने  Villagesquare.in को बताया, “हमारे देश और विदेश के अन्य हिस्सों में सुजिनी कशीदाकारी को लोकप्रिय बनाने के अपने प्रयास में हम आत्मनिर्भर और सशक्त हो गए हैं।”

मोहम्मद इमरान खान पटना स्थित पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।

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