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अविकसित क्षेत्रों के विकास की बाधा – कुशल पेशेवरों का अभाव!

भारत के बेहद अविकसित मध्य और पूर्वी पहाड़ी आदिवासी क्षेत्रों में सेवाएँ प्रदान करने वाले अध्यापक और स्वास्थ्य-कर्मियों जैसे जमीनी-स्तर के कुशल पेशेवर बहुत कम हैं। यह एक ऐसी समस्या है, जिसका कोई आसान समाधान भी नहीं है।

शिक्षक और स्वास्थ्य कार्यकर्ता देश के अविकसित क्षेत्रों में काम करना मुश्किल समझते हैं (छायाकार-अनिमेष हाजरा)

मैंने पहले चर्चा की है, कि बहु-आयामी गरीबी पर विजय पाने में योगदान की जिन प्रमुख कर्मियों से उम्मीद की जाती है, उनकी ताकत, गुणवत्ता और मनोबल को सुधारने की कितनी गुंजाइश है। हमें इस मुद्दे को दो अतिरिक्त तरीकों से देखने की जरूरत है।

इस लेख में, मैंने विश्लेषण किया है कि जमीनी कार्यकर्ताओं के अभाव की समस्या वहाँ कितनी विकट और गम्भीर है, जहाँ उनकी सबसे अधिक जरूरत है। अपने अगले लेख में, मैंने ग्रामीण लोगों की आर्थिक गरीबी के खिलाफ युद्ध में उन जमीनी कार्यकर्ताओं पर चर्चा की है, जो या तो वहाँ मौजूद ही नहीं हैं, या वे उपयुक्त क्षमता/कौशल से लैस नहीं हैं।

केंद्रीय और पूर्वी भारत के पहाड़ी आदिवासी क्षेत्र देश के बेहद अविकसित क्षेत्र हैं। इन क्षेत्रों के जिलों में वन हैं और ये पहाड़ी और दूरस्थ हैं। यह स्वाभाविक ही है कि यही देश का अति-वामपंथ (नक्सलवाद) प्रभावित क्षेत्र भी है। यह बात उल्लेखनीय है, कि सभी सरकारों का यह मानना रहा है कि, इस क्षेत्र और यहाँ के लोगों का समग्र विकास ही, अन्य तरह के आतंकवाद की तरह, खात्में का न सही, तो माओवाद के प्रभाव को कम करने का पक्का रास्ता है।

बिना बंदिश के (ईछानुसार) खर्च किया जा सकने योग्य धन (अन-अटैच्ड फंड)  

बुनियादी ढांचे में सुधार करके और जमीनी स्तर पर बेहतर कर्मियों की नियुक्ति के द्वारा सरकार इस क्षेत्र का विकास कर सकती है। झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा के इन क्षेत्रों के जिलों के लिए, पिछ्ली सरकार के समय से, बड़ी मात्रा में बिना बंदिश के खर्च किया जा सकने वाला धन (अन-अटैच्ड फंड) उपलब्ध कराया गया है। जब ये फंड तथाकथित “इंटेंसिव एरिया डेवलपमेंट” कार्यक्रमों के तहत थे, तो इनका उपयोग जिला स्तर के चुनिंदा अधिकारी फैसला ले कर सकते थे। और इसका उपयोग अक्सर सड़क एवम्‌ पुलों के निर्माण और पुलिस स्टेशनों और चौकियों जैसी सुरक्षा व्यवस्थाओं में सुधार के लिए किया जाता था।

कुछ मामलों में, धन का उपयोग कुछ दिलचस्प कामों के लिये किया गया, जैसे कि सुनियोजित लैंडस्केप-प्लानिंग या सूक्ष्म सिंचाई के लिये बुनियादी ढांचे का निर्माण। मैं समझता हूं कि इस तरह के संसाधनों के मामले में, थोड़ा सा भी अनुचित दिशा-परिवर्तन (असम्बंधित खर्च) चिंता का विषय था।

विकास-परक बुनियादी ढाँचा

संसाधनों के अनुचित उपयोग और दिशा-परिवर्तन को रोकने के लिए, ‘बिना बंदिश धन’ का उपयोग अब केवल अधिक विकासोन्मुख बुनियादी ढाँचे के निर्माण के लिए किया जा सकता है। इसके अंतर्गत हुए निर्माण को भू-टैग (स्थान/स्थिति पता लगाने की व्यवस्था) करना और उनकी तस्वीरों और जीपीएस निर्देशकांकों के साथ रिपोर्ट किया जाना जरूरी है।

यह तथ्य से सहायता मिलती है, कि इन वामपंथी अतिवाद से प्रभावित क्षेत्रों में बहुत सी खदानें भी हैं: जिला खनिज निधि से, इन क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए राज्यों की क्षमता में वृद्धि होती है। इस प्रकार, बुनियादी ढाँचे संबंधी जरूरतों को काफी हद तक पूरा किया जा रहा है।

लेकिन कर्मचारियों का क्या? मैंने पहले लेख के अपने अहसास का पालन करते हुए, इन सबसे कम विकसित क्षेत्रों में वास्तविक स्थिति पर कुछ आंकड़े जुटाए हैं। जब कर्मचारियों की स्थिति पर नज़र डालते हैं, तो जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं की कमी की समस्या काफी तकलीफ देती है।

प्रशासन का सबसे निचला पायदान

विकास विभाग के प्रशासन में सबसे निचली कड़ी के कर्मचारी – स्वास्थ्य सेवाओं और डेकेयर के स्वयंसेवक हों या स्कूल के ‘मिड-डे मील’ कार्यक्रमों में काम करने वाले रसोइयों जैसे लोग – आमतौर पर सभी स्थानीय स्तर पर काम पर रखे जाते हैं। इस समस्या की शुरुआत प्राथमिक स्कूल के एक शिक्षक से होती है, जिनकी बड़ी संख्या में नियुक्ति अल्पकालिक अनुबंध (कॉन्ट्रेक्ट) पर होती है, दुर्भाग्य से दीर्घकालिक (लंबे समय के लिए)।

ऊपरी स्तर के स्कूलों के शिक्षकों के पदों की स्थिति इससे भी बदतर है और अक्सर उनकी मॉनिटरिंग तक की व्यवस्था नहीं होती। गाँव छोटे और एक दूसरे से दूर हैं, इसलिये उन स्कूलों में छात्र भी थोड़े रहते हैं। इसलिए, मौजूदा स्कूलों का भी विलय कर दिया जाता है। सबसे बुरी समस्या सहायक नर्स दाइयों (एएनएम) के स्तर पर है। इन काडरों में आवश्यक पदों के मुकाबले स्वीकृत पदों की संख्या में भारी अंतर है, और उसपर वास्तविक नियुक्तियाँ तो स्वीकृत पदों से भी काफी कम है।

परिस्थिति की जटिलता

आमतौर पर, अग्रणी पंक्ति के कर्मियों की स्थिति जैसी होनी चाहिये, उससे कहीं खराब है। इस तथ्य से यह स्थिति और भी जटिल हो जाती है, कि माओवादी आतंकवादी इन ‘पैदल सैनिकों’ को डरा कर भगाने की कोशिश करते हैं। सच कहें, तो दूरदराज के इन इलाकों में अक्सर स्टॉफ के लोग इस ख़तरे को उपयोगी पाते हैं, क्योंकि इसका हवाला देकर वे बिना काम किए ही वेतन प्राप्त कर सकते हैं। स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में पेशेवर रूप से प्रशिक्षित कर्मचारियों की भारी कमी है और इस मुद्दे पर सरकारें अक्सर अपने हाथ खड़े कर देती हैं।

कर्मियों की यह समस्या सामने आती क्यों है? इसका जवाब स्वाभाविक और निराशाजनक, दोनों हैं। यह स्वाभाविक इसलिये है, क्योंकि जैसा परिभाषा से ही स्पष्ट है, दूरदराज़, वन, पहाड़ी और माओवाद-प्रभावित होने के कारण इन गाँव और छोटे कस्बों में जीवन कष्टदायक हो जाता है। इन क्षेत्रों में अक्सर बिजली और टेलीफोन कनेक्टिविटी की काफी समस्या रहती है। यातायात के साधन भी विशेष सुविधाजनक और नियमित नहीं हैं।

काम के लिए कठिन स्थान

इन जिलों में मलेरिया जैसी महामारी और स्वास्थ्य के लिए दूसरे गंभीर खतरे मौजूद हैं, जिनमें कुछ नियंत्रित किए जा सकते हैं, पर नहीं किए जा रहे, जैसे जशपुर में साँप के काटने से होने वाली मौतें, और कालाजार जैसी ऐसी ही दूसरी भयावह और बार-बार होने वाली समस्याएँ। इस तरह, एक अच्छा जीवन जीने की आकांक्षा रखने वाले शिक्षित युवाओं को, काम के लिये ये जगह उपयुक्त नहीं लगती। इसका परिणाम यह होता है, वे या तो पूरी तरह से वहां जाने से बचते हैं, या वहाँ नौकरी मिलने पर वहां रहने से बचने के लिए हर संभव तरीका ढूंढते हैं।

सतही तौर पर, कोई यह तर्क दे सकता है कि मध्यम वर्ग, जिसके लोग ऊपर चर्चा किए गए अधिकांश पदों पर विराजमान हैं, इन क्षेत्रों के विकास की विफलता के लिए दोषी हैं। भारतीय मध्यम वर्ग, जिसे सोशल मीडिया और अन्य इलेक्ट्रॉनिक संचार के साधन उपलब्ध हैं, ने अपने बच्चों के लिए एक उच्च और सुविधाजनक जीवन शैली पर नज़रें जमा ली हैं।

मैंने ऐसे युवक और युवतियों से बातचीत करने और प्रशिक्षण देने में व्यक्तिगत रूप से सालों बिताए हैं, जिन्होंने काम करने के लिए जानबूझकर ऐसे मुश्किल स्थानों को चुना है। लेकिन ईमानदारी से स्वीकार करते हुए कह सकता हूँ, कि जहां ये युवक और युवतियाँ उन कठिन परिस्थितियों में बेहतरीन काम करके, एक अद्भुत मानवीय सेवा कर रहे हैं, वहीं मेरे बच्चों ने शहरी जीवन का अधिक सामान्य और घिसापिटा रास्ता चुना।

उचित संसाधन-प्राप्त एक आम शहरी व्यक्ति के रूप में, मुझे उन उज्ज्वल और अच्छी तरह से प्रशिक्षित युवाओं के माता पिता के एक प्रतिनिधि के रूप में देखा जा सकता है, जिनके कौशल की इन पिछड़े क्षेत्रों में सख्त जरूरत है। और वास्तविकता यही है कि हम अन्य सुलभ कैरियर विकल्पों में अपने बच्चों के भविष्य को श्रेष्ठ समझते हैं। माइक्रोसॉफ्ट की आधुनिक दुनिया निश्चित रूप से दूरदराज की ग्रामीण दुनिया से कहीं अधिक आकर्षक है।

महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि कैसे समाज कोई रास्ता निकालेगा, जिससे अच्छी तरह प्रशिक्षित लोगों की सेवाएँ मुहैया कराकर इन दूरदराज के अविकसित क्षेत्रों की भी भरपूर देखभाल और कल्याण सुनिश्चित किया जा सके|

संजीव फनसालकर “ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया फाउंडेशन” के साथ निकटता से जुड़े हैं। वह पहले ग्रामीण प्रबंधन संस्थान आणंद (IRMA) में प्रोफेसर थे। फनसालकर भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) अहमदाबाद से एक फेलो हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।

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