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लॉकडाउन-प्रभाव

ओडिशा में स्वयंसेवक सुनिश्चित करते हैं, कि फंसे हुए प्रवासियों को भूखे न रहना पड़े

प्रवासी मुद्दों पर काम करने वाले सामाजिक सेवा कर्मी, बीच रास्ते फंसे ओडिया प्रवासियों और दूसरे राज्यों के ओडिशा में फंसे प्रवासियों के लिए भोजन की व्यवस्था सुनिश्चित करने हेतु, लोकहित में काम करने वालों, प्रशासकों और स्वयंसेवकों के साथ तालमेल कर रहे हैं

प्रवासियों के मुद्दों पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं ने यह सुनिश्चित करने के लिए नेटवर्क बनाया, ताकि तमिलनाडु में इस समूह जैसे, फंसे हुए प्रवासियों को भोजन की आपूर्ति हो सके (फोटो- ODMMI के सौजन्य से)

सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पटनायक को 22 मार्च को उनके मोबाइल पर, एक व्यथित व्यक्ति द्वारा की गई कॉल पर सुनाई पड़ा – “कृपया हमारी सहायता कीजिए। हमारे कारखाना मालिक ने कारखाना बंद करके हमें जाने के लिए कह दिया है। हम सड़क पर आ गए हैं। मेरे पास अपने परिवार को खिलाने के लिए कुछ पैसे हैं। ये ख़त्म होने पर, पता नहीं कि क्या होगा”

इसके कुछ ही मिनट के बाद पटनायक को ओडिशा के बाहर फंसे एक प्रवासी मजदूर का कुछ इसी तरह का फोन आया। जिस दूसरे व्यक्ति ने फोन किया, उसने कहा कि उसके मालिक ने उन्हें उन झुग्गियों को छोड़ने के लिए कहा है, जहां वे रह रहे थे। फोन करने वाले ने कहा – “हमारे पास रहने के लिए जगह और खाने के लिए भोजन नहीं है।”

जल्द ही पटनायक के पास देश भर से ओडिया प्रवासी मजदूरों के फ़ोन और वीडियो की झड़ी लग गई। वीडियो में बीच रास्तों पर फंसे उन प्रवासी मजदूरों की दयनीय स्थिति को दर्शा रहे थे, जो ओडिशा में अपने गांवों को लौटने के लिए उत्सुक थे।

पटनायक ने प्रवास के मुद्दों पर काम करने वाले कुछ अन्य लोगों से संपर्क किया और उन्हें पता लगा कि उन सभी को ओडिया प्रवासियों के सहायता के लिए कॉल आए थे। हालात की गंभीरता को समझते हुए, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने फैसला किया कि वे लॉकडाउन के कारण ओडिशा के बाहर फंसे प्रवासी मजदूरों के लिए काम करेंगे और उनके मुद्दों को हल करेंगे।

बीच रास्ते फंसे प्रवासी

COVID​​-19 के प्रसार को रोकने और शारीरिक दूरी सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की अचानक घोषणा कर दी गई थी। लेकिन इसके कारण उन प्रवासी मजदूरों की मुसीबत दोगुना हो गई, जो गुजर-बसर के लिए अनौपचारिक क्षेत्र में काम कर रहे थे।

ग्रामीण गरीबों को निर्माण में, खाना बनाने और घरेलू काम में मजदूरी के अवसर प्रदान करने वाले रास्ते बंद हो गए, जिस कारण वे भूख के साथ जीवन जीने के लिए मजबूर हैं। कई लोग वापिस आना चाहते हैं, क्योंकि उनके पास खाना और किराया देने के लिए पैसे नहीं थे। परिवहन सेवाएं बंद होने के साथ, बहुत से लोग अपने गाँव के लिए पैदल ही निकल पड़े, कुछ अपने बच्चों और सामान के साथ सैकड़ों मील पैदल ही चल पड़े।

टेक्नोलॉजी का उपयोग

“क्योंकि हमें घर पर ही रहने की हिदायत थी, इसलिए प्रवासियों से संपर्क बनाने के लिए हमने टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया। हम में जो लोग प्रवासियों के मुद्दों पर काम करते हैं, उन्होंने एक मोबाइल मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर ओडिशा डिस्ट्रेस मैपिंग एंड मिटिगेशन इनिशिएटिव (ODMMI) नाम से एक ग्रुप बनाया“ – इस ग्रुप के प्रमुख सदस्यों में से एक, संदीप पटनायक ने बताया।

पटनायक ने VillageSquare.in को बताया – “हमने महसूस किया कि हमें संकट में फंसे इन प्रवासियों के स्थानों का चिन्हित करते हुए हस्तक्षेप करना होगा, ताकि सरकार राज्य के बाहर इन प्रवासियों तक पहुँच सके। हमें लगा कि कोई भी भूखा नहीं रहना चाहिए।” समूह के स्वयंसेवकों को फंसे हुए प्रवासियों से हर दिन लगभग 1,000 संदेश मिल रहे हैं।

देश में किसी भी जगह फंसे हुए ओडिया प्रवासियों के बारे में जानकारी मिलने के बाद, ODMMI टीम के सदस्य इसकी तसदीक (verify) करते हैं और फिर संबंधित सरकारी विभाग को इसकी सूचना देते हैं। टीम का कोई भी सदस्य सीधे किसी से नहीं मिला। सभी को घर से काम करना पड़ रहा था, और टेक्निकल उपकरणों से उन्हें समन्वय करने में मदद मिली।

प्रवासियों तक सहायता पहुँचाना

आजीविका की तलाश में हर साल लाखों लोग ओडिशा से देश के अलग-अलग हिस्सों में पलायन करते हैं। ODMMI की टीम ने अन्य राज्यों में फंसे उन सभी लोगों तक पहुँचने की कोशिश की, जिनके पास भोजन और रहने का स्थान नहीं था। साथ ही साथ, उन्होंने ओडिशा में फंसे अन्य राज्यों के प्रवासियों को भी पका हुआ भोजन उपलब्ध कराया।

युवा स्वयंसेवकों ने ओडिशा में फंसे दूसरे राज्यों के गरीब और प्रवासी मजदूरों को पका हुआ भोजन उपलब्ध कराया (फोटो- ODMMI के सौजन्य से)

मोबाइल मैसेजिंग प्लेटफॉर्म की मदद से, टीम फंसे हुए प्रवासियों का पता लगाती है और सुनिश्चित करती है कि वे भूखे न रहें| साथ ही वे कोरोनोवायरस संक्रमण से बचने के लिए एहतियाती उपायों का पालन करने की जरूरत पर भी जोर देते हैं।

पटनायक ने बताया – “सरकार के द्वारा हस्तक्षेप के अलावा, प्रवास के स्थानों पर कुछ व्यक्तियों और धर्मार्थ संस्थाओं ने भी जरूरतमंदों को राशन प्रदान करने में अपना सहयोग दिया। वो समूह जो मुट्ठी भर सदस्यों के साथ शुरू हुआ था, उसमें अब 200 से अधिक सदस्य हैं| इनमें सिविल सोसाइटी, ट्रेड यूनियन नेता, सामाजिक कार्यकर्ता, गैर सरकारी संस्थाएं, राजनीतिक दल, पत्रकार और दूसरे लोग शामिल हैं।”

लौटते प्रवासी

मीलों पैदल चलने के बाद अपने गाँवों में पहुँचने वाले प्रवासियों के लिए भी यह उतना ही मुश्किल था। क्योंकि शहरी क्षेत्रों में इस बीमारी का पता पहले चला, इसलिए वहां से वापिस अपने गांव आने पर इन प्रवासियों का स्वागत नहीं हुआ। ओडिशा में, स्कूलों और पंचायत भवनों को अलगवास (क्वारंटाइन) केंद्रों में बदल दिया गया है, जहां प्रवासियों को 14-दिन के लिए अलगवास में रहने के लिए कहा जाता है।

यदि उनमें कोई लक्षण दिखाई पड़ते हैं, तो उन्हें विशिष्ट अस्पतालों में भेज दिया जाता है। बलांगीर जिले के एक पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता, राजीब सागरिया ने फोन पर बताया – “यह सबसे महत्वपूर्ण समय है| हम सभी लौट रहे प्रवासियों को पंजीकरण करवाने और 14 दिनों के लिए अलगवास (क्वारंटाइन) में रहने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। एक बार ऐसा हो जाए, तो ग्रामवासी खुशी से उनका स्वागत करते हैं।”

प्रवासियों के मुद्दों पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं ने यह सुनिश्चित करने के लिए नेटवर्क बनाया, ताकि तमिलनाडु में इस समूह जैसे, फंसे हुए प्रवासियों को भोजन की आपूर्ति हो सके (फोटो- ODMMI के सौजन्य से)

ग्रामीण लोग अब व्यक्तिगत दूरी, हाथ धोने और वापिस आने वाले प्रवासियों को क्वारंटाइन में रखने को लेकर अधिक जागरूक हो गए हैं। ओडिशा के पश्चिमी जिलों से, बहुत से लोग ईंट-भट्टों और निर्माण स्थलों पर काम करने के लिए पलायन करते हैं। सागरिया ने VillageSquare.in को बताया – “हम उन्हें समझा रहे हैं कि वे जहां हैं वहीँ रहें और लॉकडाउन हटने के बाद फिर काम शुरू कर दें।”

हस्तक्षेप 

हालांकि सरकार ने घोषणा की, कि वह गरीबों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के माध्यम से चावल, और सामुदायिक रसोई के माध्यम से ओडिशा में फंसे अन्य राज्यों के लगभग 70,000 प्रवासियों को पका हुआ भोजन प्रदान कर रही है, किन्तु वास्तविकता इससे काफी अलग है।

ट्रेड यूनियन सेंटर ऑफ़ इंडिया के प्रदेश अध्यक्ष, शिवराम जैसे कुछ लोगों ने फैसला किया कि जब तक सरकार भोजन या सूखे राशन के वितरण को सुव्यवस्थित करती है, वे अन्य राज्यों के फंसे हुए प्रवासियों और गरीबों को भोजन खिलाएंगे। शिवराम और स्वयंसेवकों की उनकी टीम, भुवनेश्वर के 20 सामुदायिक रसोईघरों से लोगों को खाना खिलाती है। प्रत्येक सामुदायिक रसोई द्वारा रोज लगभग 300 लोगों खाना मिलता है।

एक कार्यकर्ता और जन अधिकार मंच के सदस्य, देब रंजन कहते हैं – “गरीबों को भोजन-वितरण के लिए एक राष्ट्रव्यापी सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) की जरूरत है। जो लोग गरीब और जरूरतमंद हैं, उन्हें बिना पहचान-पत्र के भोजन मिलना चाहिए|” 

देब रंजन ने VillageSquare.in को बताया – “यदि सरकार ने इसके लिए उपाय नहीं किए, तो वह दिन दूर नहीं, जब गरीब प्रवासी भूख और भुखमरी के कारण मर जाएंगे। हमने मुख्यमंत्री को एक खुला पत्र सौंपा है, जिसमें उन्हें हालात से अवगत कराया है।”

ओडिशा सरकार ने पहले ही अलग-अलग राज्यों  में फंसे ओडिया प्रवासियों को वापिस ओडिशा लाना शुरू कर दिया है। वापिस आने वाले प्रवासियों को ग्राम पंचायत में पंजीकरण कराना और फिर 14 दिनों के लिए खुद को अलगवास (क्वारंटाइन) में रहना पड़ता है। अलगवास के बाद राज्य सरकार प्रत्येक व्यक्ति को  2,000 रुपये प्रदान करेगी।

राखी घोष भुवनेश्वर की पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।

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