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COVID-19 का सामना

जब सबसे वंचित लोगों ने साँझा किये, अपने सीमित से संसाधन!

खाद्य ज़रूरत को पूरा करने किचन गार्डन से जुड़ी एक सामूहिक पहल

महिला समूहों की आपसी सहयोग और संवेदनशीलता की संस्कृति ने कुपोषण की समस्या से निपटने में सहायक बनी (छायाकार - सचिन कुमार जैन)

कोविड-19 के संक्रमण काल में हमें रोज ऐसे चित्र देखने को मिलते हैं, जिनमें कई संस्थाएं जरूरतमंद परिवारों को राहत सामग्री प्रदान कर रही हैं| वास्तव में, इस समय खाद्य सुरक्षा का विषय, जीवन की सबसे अहम् जरूरत और सबसे बड़ी चुनौती बन गया है| लेकिन ऐसे में सबसे गरीब, उपेक्षित और कमज़ोर वर्गों द्वारा अपने बेहद सीमित संसाधनों से ऐसे परिवारों की मदद करना, जिनमें कुपोषित बच्चे या गर्भवती या नवजात शिशुओं वाली माताएं और वृद्ध सदस्य हैं| इन परिस्थितियों में इस्तेमाल किए गए संसाधनों में एक है – किचन गार्डन|

पोषण का संकट

इस महामारी के समय में, 5 साल से कम उम्र के बच्चों, गर्भवती और नवजात शिशुओं वाली महिलाओं के सामने पोषक तत्वों की कमी का संकट खड़ा हो गया| इसके मुख्य कारण लॉकडाउन, आहार-कार्यक्रमों का व्यवस्थित सञ्चालन न होना और बेरोज़गारी हैं| ऐसे में, समाज ने अपनी आंतरिक ताकत का ही इस्तेमाल किया और कुपोषण को बड़ा संकट बनने से रोका|

मध्यप्रदेश में कुपोषण के विरुद्ध सामुदायिक प्रबंधन कार्यक्रम संचालित कर रहे समूह, ‘विकास संवाद’ द्वारा किचन गार्डन तैयार करने में अनेक परिवारों को सहायता की थी| ऐसे ही 232 परिवारों ने इस संकट काल में 425 परिवारों को 37.25 क्विंटल सब्जी, यानि प्रति परिवार 16 किलो सब्जियां उपलब्ध कराईं| इस पहल द्वारा कुपोषण से प्रभावित 217 बच्चों, 140 गर्भवती और नवजात शिशुओं वाली महिलाओं और 68 बुजुर्गों को सहायता प्राप्त हुई| 

समूहों द्वारा पहल 

रीवा जिले में सक्रिय रूप से महिलाओं और बच्चों के पोषण के लिए काम कर रही, आदिवासी महिला, सियादुलारी बताती हैं – “COVID-19 संक्रमण का फैलना शुरू होने पर, हमने अपने ‘दस्तक महिला और युवा समूह’ में यह चर्चा की, कि इन परिस्थितियों में हम अपने गाँव के बच्चों और गर्भवती एवं दूध पिलाने वाली माताओं के पोषण की व्यवस्था कैसे करेंगे? यह इसलिए जरूरी था, क्योंकि गाँव के लोग सप्ताह में एक बार, 20 किलोमीटर दूर जाकर हफ्ते भर का राशन-पानी लेकर आते हैं|” 

सियादुलारी आगे कहती हैं – “लॉकडाउन के कारण गंभीर चुनौती खड़ी हो गयी थी| तब हमने गाँव गाँव जाकर दो काम किये – सार्वजनिक वितरण प्रणाली की दुकान से ज्यादा से ज्यादा लोगों को राशन दिलवाना और गर्भवती एवं दूध पिलाने वाली माताओं और 5 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए पोषण की व्यवस्था करना| ऐसा इसलिए करना पड़ा, क्योंकि 15 मार्च के बाद लगभग एक महीने तक आंगनवाडी के पोषण आहार की व्यवस्था भी सुचारू रूप से शुरू नहीं हो पायी थी| रीवा जिले के अपने कार्यक्षेत्र में हमने लगभग 1100 परिवारों को हमने किचन गार्डन तैयार करने में मदद की थी| चर्चा में तय हुआ कि सब्जियां उगाने वाले परिवार, जितना संभव हो सके, बच्चों और महिलाओं के पोषण में सहयोग करें| हम शुरू से सह-अस्तित्व की भावना को प्रोत्साहित करते रहे हैं|”

बिट्टी बाई इसे अपनी जिम्मेदारी समझती हैं कि उनके गांव का पहले से कमजोर बच्चा हिमांशु कुपोषण का शिकार न हो (छायाकार – सचिन कुमार जैन)

कुछ कहानियां सहयोग एवं संवेदना की 

  • सतना जिले के डाड़िन गाँव की रज्जी बाई मवासी की दो बेटियां, कृष्णा और सुकांति, अतिगंभीर कुपोषण से पीड़ित थीं| पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती करने पर उनकी स्थिति में कुछ सुधार आता, किन्तु वह फिर उसी चक्र में फंस जातीं। 2016 में उन्होंने किचन गार्डन शुरू किया, जिससे उन्हें लगभग नौ महीने की सब्जियाँ मिलने लगी| इस तरह उनके परिवार से कुपोषण का खतरा तो कम हुआ ही, साथ ही वे बाज़ार में भी कुछ सब्जियां बेचने लगे|लॉकडाउन होने पर उन्होंने अपनी जरूरतें पूरी करने के बाद, गांव के ही जरूरतमंद लोगों, जैसे – अच्छे लाल, राम लखन, अनुज, संपतिया, बूटी मवासी को भी हर हफ्ते दो-तीन बार 25 किलो सब्जियां देनी शुरू की| रामखिलावन मवासी कहते हैं कि “हमें पता था कि अच्छे लाल की आर्थिक स्थिति खराब है और उसकी बेटी कमज़ोर (कुपोषित) भी है| इसलिए हमें लगा कि उनके परिवार की मदद की जानी चाहिए| महामारी जैसे समय में अगर हम एक दूसरे का साथ नहीं देंगे तो कौन देगा?”
  • मुड़खोहा गाँव के राजभान गोंड के यहाँ सब्जियों के 280 पौधों के अलावा कटहल, अमरुद और आम के पेड़ भी हैं| वे 25 मार्च से उन सात परिवारों को सब्जियां दे रहे हैं, जिनमें कुपोषित बच्चे या गर्भवती महिलाएं हैं| उनका कहना है कि “बीमारी का तो डर है, किन्तु हमें अपने समाज के बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा का भी ध्यान रखना है.”
  • सतना जिले के देवलहा गाँव की आदिवासी महिला, ललता, पिछले चार साल से किचन गार्डन लगा रही हैं| उन्होंने आधे बीघे में टमाटर, तोरई, भिन्डी, बरबटी, पालक और गेंदा फूल लगाए हैं| इससे उन्हें हर महीने 2000 रूपए कमाई होती है, लेकिन COVID-19 के बाद से वे 11 जरुरतमंद परिवारों को निशुल्क सब्जी दे रही हैं।
  • पन्ना जिले के विक्रमपुर गाँव की एक विकलांग महिला, कस्तूरी बाई, ने 2-3 दिन नमक से रोटी खाई, क्योंकि उनके पास आटे और नमक के अलावा कुछ और था ही नहीं| जब तुलसा बाई को पता चला तो उन्होंने अपनी बाड़ी से सब्जी भिजवाई। डेढ़ महीनों से यह सिलसिला जारी है। चौदह गांवों में 41 परिवारों ने 573 किलो सब्जियां समुदाय में निशुल्क दी हैं|
  • पटी गाँव की विट्टी बाई लॉकडाउन के बाद, सबसे पहले दिहाड़ी पर काम करने वाले उसी गाँव के निवासी हरिशंकर के घर गयीं, क्योंकि उनका बेटा हिमांशु कुपोषित था| विट्टी बाई ने तय किया कि जब तक लॉकडाउन है, तब तक परिवार को सब्जियां मिलती रहें|

सशक्तिकरण के प्रभाव – व्यापक होती सोच

परियोजना से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता, रवि पाठक कहते हैं कि “महामारी ने लोगों को बहुत भयभीत कर दिया है, किन्तु लोगों ने परिस्थिति का सामना करने के रास्ते निकालने भी शुरू कर दिए हैं। इसमें सबसे आगे वह महिलाएं रहीं, जो तीन-चार सालों से स्वास्थ्य, पोषण और नेतृत्व क्षमता विकास की प्रक्रिया से जुड़ी हुई हैं|”

  • गांधीग्राम गाँव की रविता अहिरवार ने प्रवास से लौटी हरिबाई के परिवार की मदद की| हरीबाई के पास न तो जमा राशि थी, न ही अनाज के अलावा कोई खाद्य सामग्री| पहले दिन उन्होंने नमक से ही रोटी खाई| तब रविता अहिरवार ने दस्तक महिला समूह में चर्चा की और निर्णय लिया कि जिन परिवारों के पास भी किचिन गार्डन हैं, वे अन्य जरूरतमंद परिवारों का सहयोग करेंगे| 
  • सतना जिले के कैल्होरा की कृष्णा मवासी ने 15 परिवारों को सब्जियां बांटी। जब यह कहानी विकास संवाद के सदस्य विजय यदुवंशी द्वारा ट्वीट किया गया तो मुख्यमंत्री ने इसकी सराहना की| अगले दिन स्थानीय सांसद गणेश सिंह गाँव पहुंचे और गांव में 15 लाख रूपए के विकास काम शुरू करवाए|
  • रीवा जिले की नीरू कोल कहती हैं कि “आज पूरी धरती पर संकट है|अभी धन-संपदा का कोई मोल नहीं| मोल तो उस सबको साझा करने का है, जो भी अपने पास है| पहले हम अपनी बाड़ी की कुछ सब्जियां दूसरे परिवारों के साथ बांटते थे| अब हम 13 परिवारों के साथ अपनी सब्जियां बाँट रहे हैं| ये कोई दान या भीख नहीं है|”
  • उमरिया के मगरघरा गाँव की केसरी बाई बताती हैं – “जब लॉकडाउन हुआ, तब मन में यह बात आई कि यदि गाँव में सब्जियां बाँट दीं, तो अपना काम कैसे चलेगा? लेकिन फिर वो सब बातें याद आई, जो हम अपने दस्तक समूह में करते रहे| कहते रहे कि सभी बच्चों को हृष्ट-पुष्ट बनाना है| तब तय किया कि जितना भी उत्पादन हो सबके साथ साझा करना है| अब तक 90 किलो सब्जियां अन्य परिवारों के साथ साझा की हैं|”
  • मनमानी पंचायत की बाबी बाई कहती हैं – “आज लोगों के पास काम-धंधा नहीं है, तो उनकी मदद करने कौन आएगा? सब बंद है| लोगों के पास पैसे भी नहीं है और हमारे यहाँ सब्जी लगी है| आज अपनों के काम नहीं आएंगे तो हमारे रहने का कोई मतलब नहीं होगा|”

समाज की आंतरिक ताकत – लड़ रही संकट से

मध्यप्रदेश में कुपोषण गंभीर विषय है। यहाँ 11 लाख कुपोषित बच्चों के परिवार बहुत जद्दोजहद करके अपनी जरूरतों को पूरा कर रहे हैं। COVID-19 से उत्पन्न हुई स्थितियों ने ज्यादा बड़ी समस्याएं खड़ी कर दीं| लेकिन सामाजिक बदलाव के लिए किये जा रहे संस्थागत कार्यों के असर की पड़ताल भी तो ऐसे ही संकट के समय में होती है| ऐसे में 100 गांवों में कुपोषण के सामुदायिक प्रबंधन के लिए संचालित कार्यक्रम में, 5867 किचिन गार्डन और महिला समूहों के सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण के प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं|

कुपोषण मिटाने के उद्देश्य से चलाये जा रहे कार्यक्रम में जल संरचनाएं भी बनाई गयीं, बीजों का संरक्षण और खेती का विकास, किचिन गार्डन भी स्थापित की गईं हैं। इस क्षेत्र में बच्चों पर पड़ रहे असर का अध्ययन किया जा रहा है| अध्ययन के मुताबिक 1435 परिवारों में से 232 परिवारों ने 425 परिवारों के साथ तकरीबन 37.25 क्विंटल सब्जियां निशुल्क साझा कीं। यानी सामाजिक बदलाव के लिए सामाजिक संस्थानों द्वारा किए जा रहे सतत प्रयासों से समानुभूति एवं सहयोग का भाव तो पैदा हो रहा है|   

सचिन कुमार जैन मध्य प्रदेश के पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।

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