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COVID-19: लॉकडाउन संकट और डोंगरिया कोंध

डोंगरिया कोंधों को लॉकडाउन के दौरान, करना पड़ रहा है वन उपज बेचने के लिए संघर्ष

लघु वनोपज की फसल का मौसम और लॉकडाउन एक ही समय होने के कारण, नियामगिरि पहाड़ियों के आदिवासियों को, जंगल पर आधारित अपनी आजीविकाओं को बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

सिंधे वाडाका, लॉकडाउन से प्रभावित डोंगरिया कोंध आदिवासी समुदाय से हैं, जो अपनी वन उपज नहीं बेच पाई (छायाकार - सुशांत कुमार दलाई)

भारत में आदिवासी समुदायों लिए महामारी COVID-19 का प्रभाव विनाशकारी रहा है। ओडिशा के रायगड़ा और कालाहांडी जिलों की नियामगिरी पहाड़ियों में बसे, और 75 विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूहों में से एक, डोंगरिया कोंध आदिवासी भी इसमें कोई अपवाद नहीं हैं।

गुजर-बसर के लिए कृषि के अलावा, लघु वनोपज (एमएफपी) इकट्ठी करके बेचना उनकी आजीविका का मुख्य स्रोत है। लेकिन लंबे समय तक लागू लॉकडाउन के कारण लघु वनोपज से होने वाली उनकी महत्वपूर्ण आमदनी बाधित हुई है, जिससे उनकी आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

वन-आधारित आजीविका

डोंगरिया कोंध लोगों की खेती वर्षा पर आधारित है। वे बाजरा, दालें, चावल और सब्जियाँ उगाते हैं। उनकी ज्यादातर पैदावार उनके स्वयं के उपभोग के लिए होती है। कटाई के बाद का समय वे मिट्टी तैयार करने, खेत जोतने, आदि में लगाते हैं| जब जून-जुलाई में बारिश का मौसम शुरू होता है, तो जमीन तैयार होती है।

आदिवासी लोग, मार्च से जून के बीच लघु वनोपज इकठ्ठा करते हैं, जब उन फसलों का पीक सीज़न होता है। वे सियाली (bauhinia sp.), हरड़ या मिरोबालन (terminalia chebula), बहेड़ा (terminalia bellirica), करोंदा, इमली और केन्दु (diospyros) के बीज और पत्ते एकत्रित करते हैं।

जहां सियाली के पत्तों का उपयोग प्लेट बनाने के लिए किया जाता है, हरड़ का उपयोग त्वचा की बिमारियों और एलर्जी के ईलाज के लिए किया जाता है। बहेडा एक औषधीय पौधा है, जिसके फल में बैक्टीरिया-रोधी गुण होते हैं, जिनका उपयोग इन्फेक्शन ठीक करने के लिए होता है। केंदू पत्ते से बीड़ी बनती है।

डोंगरिया कोंध जंगलों से मार्च से जून के महीनों में लघु वनोपज इकट्ठा करते हैं और इसी अवधि में ही लॉकडाउन भी लागू रहा (छायाकार – सुशांत कुमार दलाई)

प्रत्येक परिवार मार्च से जून के बीच ये उपज बेचकर प्रति माह लगभग 4,000 से 6,000 रुपये कमाता है। वे अपनी लघु वनोपज चटीकाना जैसे आस-पास के साप्ताहिक बाजारों में बेचते हैं। इस धन से, वे अगले सीजन के लिए पशु और कृषि का सामान (बीज, खाद, आदि) खरीदते हैं। वे मानसून शुरू होने से पहले अपने घर की मरम्मत भी करते हैं।

आजीविका का नुकसान 

रायगड़ा जिले के बिस्समकटक प्रशासनिक ब्लॉक की कुर्ली पंचायत के खजूरी गांव की एक डोंगरिया कोंध महिला, सिंधे वडाका (47) ने बताया – “एक रुपया भी कमाना मुश्किल है। हमने हरड़ और बहेडा की भरपूर फसल ली। लेकिन हमें कोई खरीदार नहीं मिला। हमारी सारी फसल बर्बाद हो गई है।”

सिंधे वडाका ने VillageSquare.in को बताया – “वन उपज पेड़ों पर लगी हैं। हम गहरे संकट में हैं| न तो हमारे गाँव में व्यापारी आ रहे हैं और न ही हमें उपज बेचने के लिए नियामगिरी की तलहटी में जाने की अनुमति है। हम नहीं जानते कि आगे क्या करना है।”

खजुरी गाँव के श्याम वडाका (46) की भी ऐसी ही तकलीफ है। वे VillageSquare.in से कहते हैं – “हमने सियाली के पत्ते और बीज, हरड़, बहेडा और आंवले इकट्ठे किए हैं। लेकिन हमसे खरीदने वाला कोई नहीं है| हम चटीकाना बाजार नहीं जा सकते, और इसलिए हम अपनी उपज बेचने और कुछ कमाने में असमर्थ हैं।”

अपर्याप्त सहयोग

सिंधे वडाका और श्याम वडाका की स्थिति उन सैकड़ों डोंगरिया कोंध आदिवासी लोगों की तरह ही दुर्दशापूर्ण है, जो COVID​​-19 महामारी के कारण लंबे समय तक लागू लॉकडाउन के चलते, खेती और जंगल पर आधारित अपनी आजीविका को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

स्थानीय समुदाय के अनुसार सरकारी सहयोग अपर्याप्त है। खजूरी गॉंव की गंगा कदराका ने VillageSquare.in को बताया – “सरकार ने हमें तीन महीने के लिए चावल दिया है। यह हमारे लिए काफी नहीं है। हमारे बच्चे हैं। हम अभी कुछ भी नहीं कमा पा रहे हैं।”

आदिवासियों को सरकार द्वारा दी गई सहायता कम क्यों लगती है, इसके कई कारण हैं। गोवर्धन वडाका के अनुसार – “सरकार ने हमें चावल के अलावा और कोई भी किराना का सामान नहीं दिया है। हम सिर्फ चावल नहीं खा सकते। हमें चावल के साथ खाने के लिए दाल या करी जैसी कोई चीज चाहिए। हम सरकार से तत्काल मदद करने करने के लिए गुहार लगा रहे हैं।” ग्रामीण सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम चावल के अलावा दाल और बाजरे जैसे खाद्य पदार्थ भी उपलब्ध कराए।

विफल खेती

पिछले कुछ वर्षों में नियामगिरि में खेती उतनी सफल नहीं रही है, जिस कारण हालात बदतर हो गए हैं। ग्रामीणों के अनुसार, पहले बम्पर पैदावार होती थी, जिससे खेती काफी लाभदायक थी। परिवार की खपत के लिए रखने के बाद, बची हुई उपज वे स्थानीय साप्ताहिक बाजारों में बेच देते थे।

लॉकडाउन के कारण कृष्ण कदराका अपनी एकत्र की गई वन उपज बेच नहीं पाए (छायाकार – सुशांत कुमार दलाई)

सिंधे वडाका अपनी लाल चने की फसल का जिक्र करते हुए कहती हैं – “इस साल, अरहर की फसल फेल हो गई। हालांकि पौधे जीवित रहे, लेकिन फूल समय से पहले गिर गए। पहले हमें शायद ही खाने के लिए बाहर से खरीदना पड़ता था। बल्कि हमारे पास फसल बचती थी, जिसे हम स्थानीय बाजारों में बेचते थे। लेकिन इस साल, हमने अपनी जमीन पर जो भी खेती की, वह बेकार गई।”

लगातार हो रही बारिश का असर नियामगिरी की फसलों पर भी पड़ रहा है। शिंदे वडाका के  अनुसार – “बारिश हमारी कोसला फसल को नुकसान पहुंचा रही है। कभी-कभी वर्षा बहुत अधिक होती है और कभी धूप  बहुत अधिक पड़ती है। ऐसा लगता है कि हम इस साल अपनी कोसला फसल भी खो देंगे। हम भारी परेशानी में हैं।”

उपज की बिक्री

कद्रगुमा गाँव की कृष्णा वडाका (55) कहती हैं – “हम अपनी हल्दी, अनानास, अदरक, कटहल और सियाली पत्तियां कैसे बेचें? हमारे पास हरड़, बहेड़ा और आंवला है। हम उन्हें बेचने के लिए चटीकाना बाजार नहीं जा पा रहे हैं। केंद्र सरकार ने 49 लघु वनोपजों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तय किया है। ओडिशा सरकार ने इनमें से 16 उपज के लिए न्यूनतम समर्थन मुल्य में वृद्धि की मांग की है, क्योंकि बाजार में इनकी कीमत केंद्र द्वारा निर्धारित मुल्य से ज्यादा है। राज्य सरकार ने पांच नई उपज इस सूची में शामिल करने की भी मांग की है।”

नियामगिरि के डोंगरिया कोंध लोगों के साथ काम करने वाले एक कार्यकर्ता, सुशांत कुमार दलाई ने VillageSquare.in को बताया – “भारत भर में वनवासी समुदायों को लॉकडाउन के दौरान अपनी लघु वनोपज बेचने में बहुत दिक्कत हो रही है|  सरकार को इन समुदायों से उपज खरीदने में तेजी लानी चाहिए।”

अभिजीत मोहंती दिल्ली स्थित डेवलपमेंट प्रोफेशनल हैं। उन्होंने भारत और कैमरून में  मूल निवासी समुदायों के साथ बड़े पैमाने पर काम किया है। विचार व्यक्तिगत हैं।

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