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झारखण्ड कोयला उत्खनन

साईकिल पर अस्तित्व का बोझ

एक तरफ कोयला चोरी दूसरी तरफ व्यापारी, इन बीच झारखण्ड के युवक- युवती आजीविका हेतु कई विडंबनाओं का सामना कर रहे हैं।

हाइवे पर कोयले से भरी एक साइकिल को धक्का देते हुए “कोयलावाला” (छायाकार : मनिष कुमार शुक्ला )

वर्ष २००० में बिहार से अलग होकर झारखण्ड की स्थापना की गयी, अपनी खनिज सम्पदा के कारण झारखण्ड शुरू से ही सुर्खियां बटोरने लगा । नए राज्य के निर्माण के साथ नए निवेश और नए व्यपार के साधन भी झारखण्ड से जुड़े । इन सब में सबसे ज्यादा पकड़ थी कोयला उत्खनन की, जो दशकों से चली आ रही थी ।

पहले बिहार के लिए, पर अब नए बने झारखण्ड के लिए । झारखण्ड कोयला खनन और उत्पादन में देश में पहला स्थान रखता है,  ये बात शायद ही किसी को बताने की जरुरत हो । लेकिन आजीविका के लिए कोयले से जुड़े लोगों की कहानी अक्सर पता नहीं चलती।

झारखण्ड में कई ऐसे जिले और प्रखंड है जहाँ कोयले का खनन और उत्पादन किया जाता है ।

जिला रामगढ

रांची से लगभग १०० km दूर रामगढ जिले से करीब १५ किलोमीटर, जंगलों के अंदर गांव अरगड़ा और उसके पास ही है कोयला माइंस जिसे छपरी के नाम से जाना जाता है । रामगढ के आस पास बसे प्रखंड जैसे गोला, चितरपुर आदि में भी कोयला खनन मजदूरों के आजीविका का साधन है ।

कई माइंस आज भी सक्रिय है और सरकार के निर्देशानुसार ही चालित हैं, लेकिन सरकारी लीज़ ख़तम होने के बाद बंद पड़े माइन्स की संख्या भी काफी हैं ।

स्थिति और वास्तविकता

आदिवासी मूल के ज्यादातर लोग या तो खेती बाड़ी करते हैं या फिर गांवों और शहरों में मजदूरी करके अपनी आजीविका चलाते  हैं । इन मजदूरों का एक बड़ा तबक़ा कोयला माइंस में खनन करके अपना गुजर बसर चलाता हैं । अपने गांव के आसपास कोयले के अधिकता होने से गांववालों की ईंधन की जरुरत भी पूरी हो जाती हैं । लेकिन बिचौलियों द्वारा इस बात का फायदा उठा कर कोयले की चोरी के मामले भी सामने आते दिखे ।

इन चोरी की रोकथाम  के लिए सरकार ने किसी भी अनाधिकृत वाहन से कोयले की ढुलाई को अपराध घोषित किया । गांववालों की कोयले की जरुरत पूरा करने के लिए सरकार ने उन्हें साईकिल से कोयला ले जाने की छूट दी । बदलते परिवेश में ये छूट एक नये रोजगार के रूप में सामने आया।

रात के अँधेरे में इन इलाकों में कई सुलगते खेत देखने को मिल जायेंगे (छायाकार : मनिष कुमार शुक्ला )

आसपास कोयला माइंस होने के कारण, गांव के लोगों का मजदूरी के लिए वहां जाना स्वाभाविक होता है, कई छोटे माइंस में आज भी मैन्युअल फ़ोर्स से सरफेस या ओपन पिट माइनिंग करते हैं । यहाँ काम करने वाले मजदूरों को धीरे धीरे माइनिंग की समझ भी हो जाती हैं । अपनी माइनिंग अवधि पूरी होने के बाद या रिन्यूअल नहीं होने के कारण कई माइंस बंद कर दिए जाते हैं । प्रावधान के हिसाब से तो, बंद माइंस को वापस भरने का जिक्र होता हैं पर ऐसा कम ही देखने को मिलता है।

माइंस के बंद होने के बाद, वहां के मजदूरों का रोजगार भी छीन जाता हैं, और यहीं शुरु होता हैं साईकिल से कोयले के ढ़ुलाई । कोयले के माइंस में काम कर चुके मजदूर और उनका परिवार इन बंद पड़े माइंस से कोयला निकालने में लग जाते हैं ।

हर काम शारीरिक क्षमताओं के अनुसार बांटा जाता हैं, माइंस के बाहरी सतह पर खुदाई या ढुलाई महिलाये करती हैं, जबकि बच्चे कोयले को इकट्ठा करने और बोरियों में भरने का काम करते हैं । अंधेरो में और ज्यादा अंदर की माइनिंग ज्यादातर पुरुषों द्वारा की जाती हैं । कंपनियों द्वारा इन माइंस का दोहन होने के बाद बहुत ही थोड़ा कुछ बच जाता हैं ।

 कई बार इन माइंस में पानी का भर जाने या धंस जाने जैसे मामले भी सामने आते हैं जिनमे मरने वाले ज्यादतर मजदूर ही होते हैं । ऐसा नहीं होता की विषम परिस्थियों के बाद निकाला गया कोयला आप सीधा बेच सकते हो । इन्हे ‘पत्थर कोयला’ यूँ ही नहीं कहा जाता, माइंस से इन पत्थर कोयलों को निकालने के बाद अलग अलग तरीके से ये मजदूर अपने घर लाते हैं ।

बड़े टुकड़ों को छोटा किया जाता हैं फिर अपने आँगन या खेत में खड्डा खोद कर इन्हे रात भर जलाया जाता हैं । इस प्रक्रिया को ‘तोपा’ करना कहतें हैं । खान या माइंस से निकाले गए कोयले में मिटटी काफी होती है और इनका वजन भी ज्यादा होता हैं,  साथ ही ये जलाने के लिए भी उपयुक्त नहीं होते हैं ।

रोजगार और उत्कर्ष

जलते कोयलों को पानी से बुझा कर फिर सुखाया जाता हैं ताकि ये थोड़े हलके हो जाये । फिर इन्हे वजन के हिसाब से प्लास्टिक और जूट की बोरियों में भरा जाता हैं । सबसे ज्यादा मुश्किल होता हैं इन बोरियों को साईकिल पर लादने की तकनीक । हर एक साईकिल पर लगभग १५० से २५० KGs कोयला बोरियों में लादा जाता हैं । इन साईकिलो की चैन भी उतार दी जाती हैं ताकि पैडल ढुलाई के समय बीच में न आये । शाम तक साईकिल कोयलों से लद कर तैयार हो जाती हैं और ढोने वाला भी ।

अगली सुबह या आधी रात से शुरू होता है यह सफर, गांव से साईकिलो को धकेल कर हाईवे लाना और फिर हाईवे से रांची जैसे नज़दीकी शहरों तक पहुँचाना । रास्ते के लिए पानी और खाना भी साईकिल पर ही सजा होता हैं और ज्यादातार वे ३-४ की टोली में चलते हैं ।

साईकिल पर ले जाते हुए ‘कोयला वालों’ का समूह (छायाकार : मनिष कुमार शुक्ला)

ऐसा कहतें है की जरुरत ही आविष्कार की जननी होती है और यह साबित किया है इन कोयला वालों ने । हाईवे केवल समतल, सीधी ही नहीं होती कई बार तीखे मोड़ और चढ़ान वाली भी होती है, ऐसे खड़े चढ़ाई में कोयला से लदे इन भारी भरकम साइकिलों को धकेलना नामुमकिन हो जाता है ।  इस परेशानी का समाधान एक जुगत लगा कर की जाती है, चढान के आस पास के गॉंवावाले अपनी मोटरसाइकिल, स्कूटर आदि में रस्सी बांध कर इन कोयलवालों की साईकिल खींचते हैं, चढान पर करवाने का भाड़ा भी निर्धारित होता है । अब तो कई कारों से भी ये काम किया जाने लगा है, कार में एक साथ ५-६ साइकिलों को बंधा कर खींचना आसान होता है और मोटरसाइकिल के मुकाबले समय की भी बचत होती है ।

अपनी साईकिल को कार से बांधते हुए, हेरोन नायक बताते हैं कि, “रांची पहुंचने में ऐसे चार पांच बड़े चढ़ान आते हैं। छोटे मोटे तो हम हिम्मत कर के पार कर लेते हैं, पर हर बड़े चढान को पार करवाने के लिए गाड़ी वालों को ४० -५० रूपया भाड़ा देना पड़ता है । अब हर चढ़ान गाड़ी से पार करेंगे तो कमाएंगे क्या, और खाएंगे क्या ?”

हाईवे पर कई ढाबे, ईंट भट्ठी और साप्ताहिक हाट ज्यादातर इनके ग्राहक होते हैं ।  इन भारी भरकम साईकिल को धक्का दे कर १०० -१५० km  की दुरी तय करना रहता है । ऐसे में ”रात में क्यों निकलना ?” पूछने पर कन्ज़ी गांव के कारंवा साव ने बताया की – रात में उन्हें न तो हाईवे पर कोई परेशान करता और अगर जल्दी सुबह शहर पहुंचने पर वे ट्रैफिक में भी नहीं फसते है। और तो और ढ़ाबे वालों को भी खाना बनाने के लिए कोयला जल्दी मिल जाता हैं ।

कई धूर्त लोग कोयला गिरवा कर फिर भाव कम करतें हैं, और कोयलों को वापस रखना काफी मुश्किल होता हैं मजबूरन उन्हें कम दाम में कोयला बेचना पड़ता हैं । दिन, जितना ऊपर चढ़ता हैं दाम उतना नीचे गिरता हैं, कोयला अगर नहीं बिका तो पूरे दिन उसे साईकिल पर ढोए वापस ले जाना पड़ता है।

आगे पूछने पर रामगढ के राजनाथ नायक से पता चला की, ”एक बार जो सारे कोयले बिक गए तो वापस गांव कैसे आते हैं ?” 

वापसी में इन साईकिल वालों के लिए  रेत और ईंट ढोने वाले ट्रक का सहारा लेना पड़ता है, कईं ट्रक वाले इनसे पैसे भी लेते हैं पर इस तरह वे अपनी साईकिल ट्रक में लादकर गांव के पास के हाईवे तक पहुँच जाते हैं । कोयला माइंस से निकाल कर, जलाने लायक बनाना, साईकिल से इस तरह शहर में बेचने की पूरी प्रक्रिया में २ से ३ दिन का समय और इस एक ट्रिप में लगभग ३००० से ३५०० तक की कमाई हो जाती हैं ।

अंत या आरंभ

एक तरफ तो एक ट्रिप में ३५०० तक की कमाई दिखती हैं वहीँ दूसरी ओर हर कदम पर जान जाने का खतरा । फिर चाहे बात माइंस के धसने से हुई मौत का हो या हाईवे पर हुई दुर्घटना का । इस मेहनतकश  काम में आदिवासी युवाओं की संख्या का बढ़ना, गांव के परम्परिक आजीविका जैसे – खेती से दुरी की ओर भी इशारा करता है ।

शारीरिक रूप से थका देने वाला यह काम, युवाओं के गिरते स्वास्थ्य और उनके नशा करने का कारण भी बनता दिखाई देता है । वजह भले कुछ भी हो लेकिन वैकल्पिक तौर ही सही, पर साइकल से कोयला धुलाई समाज में आजीविका का एक नया चेहरा बनता दिखाई दे रहा है ।

अगली बार जब आप हाईवे के किसी ढ़ाबे पर दाल-मखनी का स्वाद ले तो एक बार ये जरूर सोच ले की, ”उसे बनाने के लिए कोयला कैसे कैसे पहुँचता हैं ?” (छायाकार : मनिष कुमार शुक्ला )

मनिष कुमार शुक्ला झारखण्ड केन्द्रीय विश्वविद्यालय से मास कम्यूनिकेशन में स्नातकोत्तर है। मनिष कुमार पिछले 9 वर्षो से फोटोग्राफर और फिल्म मेकर के रूप में भारत के विभिन्न समाजसेवी संस्थाओ के साथ जुड़े है । विचार व्यक्तिगत हैं।

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