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समस्याओं को सुलझाने और अपने गांव का कायापलट करने के लिए एकजुट हुई महिलाएँ

ग्राम संगठन की छत्र-छाया में महिला स्व-सहायता समूहों की सदस्य, खनन कंपनी के खिलाफ गतिरोध सहित, अपने गाँव की सांझी समस्याओं का समाधान करती हैं

कोयला खनन के कारण रामपुर गांव के पास बंजर घाटियां बन गई हैं, ग्रामवासी अपने गाँव में खनन के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं (छायाकार - कैलाश कोकरे)

रामपुर गांव में संथाल आदिवासियों की आबादी सबसे अधिक है। ग्रामवासियों ने अपने जीवन और धर्म के पारंपरिक तौर-तरीके बरकरार रखे हैं। समय के साथ, कुछ संथालों ने हिंदू धर्म और ईसाई धर्म को अपना लिया। गाँव में शराब का सेवन और घरेलू हिंसा आम बात थी।

खेतीबाड़ी उनकी आजीविका है। ग्रामीणों को बचत करने की आदत नहीं थी। जरूरत पड़ने पर, वे सोने के आभूषण या इस तरह की दूसरी चीजें गिरवी रखकर, महाजन या स्थानीय साहूकार से पैसे उधार लेते थे। इसके लिए वे साहूकार को हर महीने ब्याज देते थे, जो 5% से 10% तक हो सकता था।

लगभग 10 साल पहले, महिला स्व-सहायता समूहों का गठन किया गया। इन स्व-सहायता समूहों और एक ग्राम संगठन की स्थापना से, न केवल रामपुर गांव आर्थिक रूप से कायापलट हो गया, बल्कि ग्रामवासियों को एक साथ आकर विचार-विमर्श करने और सामाजिक मुद्दों को सुलझाने का अवसर भी दिया।

एक अधिक मूलभूत परिवर्तन जो देखा जा सकता है, वह है ग्रामवासियों के बीच उन कोयला खनन कंपनियों के अतिक्रमण के खिलाफ संघर्ष में उनकी एकता, जो परंपरागत तौर पर पूर्वजों से मिले उनके गाँव और खेतों को हथियाना चाहती हैं।

पैसे की बचत

वर्ष 2008 के शुरू में, जब एक स्थानीय गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) के प्रतिनिधियों ने रामपुर गाँव का दौरा किया, तो ग्रामवासी आशंकित थे। एनजीओ के प्रतिनिधियों ने ग्रामवासियों को महिलाओं के कई स्वयं सहायता समूह बनाने के लिए कहा, जो साप्ताहिक और/या मासिक आधार पर, पैसे इकट्ठे करें और बचाएं, ताकि बाद में घरेलू जरूरतें पूरी करने के लिए ये पैसे काम आ सकें।

ग्रामीणों के बचत एक अनजान बात थी। एक ग्रामवासी महिला, सावित्री ने बताया – “शुरू में, हम कुछ अनजान लोगों पर विश्वास करने से डर रहे थे, जो हमें पैसे बचाने के लिए कह रहे थे। हम हैरान थे कि उन पर विश्वास कैसे करें, और चिंतित थे कि वे हमारे पैसे लेकर जा सकते हैं।”

ग्रामवासियों सोचते थे कि उनकी खेतीबाड़ी ही ठीक है, क्योंकि उनका कई पीढ़ियों से इसी तरह चल रहा था। जब एनजीओ के लोगों ने सब कुछ विस्तार से बताया, तो ग्रामवासी आश्वस्त हो गए। महिलाओं के स्वयं सहायता समूह (SHG) बनाने पर सहमति बन गई।

कायापलट

महिलाओं ने अपने पति से मिले पैसों में से बचाना शुरू कर दिया, लेकिन उनकी  बचत का मुख्य हिस्सा उनकी मजदूरी से कमाई दिहाड़ी में से होता था। पुरुषों द्वारा बचत के पैसे के इस्तेमाल के साथ महिलाओं को परिवार के आर्थिक फैसलों में भूमिका मिली। घरेलू हिंसा और शराब के सेवन की घटनाओं में भी कमी आई।

इन 10 वर्षों से अधिक के समय में, स्व-सहायता समूह का स्वरूप आर्थिक जरूरतों को पूरा करने से आगे तक विकसित हुआ है। महिलाओं द्वारा चलाए जाने वाले समूह, 1% के न्यूनतम ब्याज पर ऋण प्रदान करते हैं। पैसा बैंक में जमा किया जाता है और प्रत्येक सदस्य को लेनदेन के ब्यौरे के साथ एक पुस्तिका मिलती है। इससे पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित होती है।

ग्रामवासी कई उद्देश्यों के लिए धन का उपयोग करते हैं, जैसे कि घर का निर्माण, निजी स्कूलों में बच्चों की शिक्षा, खेती में निवेश, चिकित्सा-खर्च, आदि। आर्थिक सशक्तिकरण और सामाजिक स्वीकृति के कारण, महिलाओं का आत्म-विश्वास बढ़ा है।

अपने 10 महिला समूह बनाने, कुछ महिलाओं के नेतृत्व के गुणों के विकसित होने, और आवश्यक प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद, महिलाओं ने एक ग्राम संगठन (वी.ओ.) का गठन किया, जिसका चुनी हुई महिलाएं नेतृत्व करती हैं। सभी समूह, ग्राम संगठन का हिस्सा बन गए, जहां उन्होंने अपनी सामुदायिक समस्याओं पर काम करने का फैसला किया।

समस्याओं से निपटना 

जिन चुनौतियों का उन्हें सामना करना था, उनमें ‘डे-केयर सेंटर’ में बच्चों को पौष्टिक मिड-डे मील न मिलना, शौचालयों की कमी, शहर जाने वाली सड़क का अभाव, आदि शामिल थे। प्रधानमंत्री आवास योजना का अनुचित क्रियान्वयन, और सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार जैसी भी कुछ अन्य समस्याएं थीं।

इससे पहले ग्रामवासियों को एक साथ आने और आम मुद्दों पर चर्चा करने के बहुत कम अवसर मिलते थे। एक समूह की सदस्य, मेरी के अनुसार – “बहुत करीबी पड़ोसियों के अलावा, महिलाएं किसी से बातचीत नहीं करती थी।” अपने अधिकारों और विभिन्न सरकारी योजनाओं के बारे में जागरूकता सीमित थी।

ग्राम संगठन बनने के बाद, सभी स्व-सहायता समूहों की सदस्य, बैठक के लिए महीने में एक बार इकठ्ठा होने लगी। महिलाएँ गाँव के अग्रणियों को बैठकों में आमंत्रित करती हैं। विकास गतिविधियों में रुचि होने के कारण, कभी-कभी पुरुष भी बैठकों में आते हैं। बैठकें, मुद्दों के बारे में सवाल करने, अपनी चिंताएं व्यक्त करने और समस्याओं के समाधान खोजने का अच्छा अवसर प्रदान करती हैं।

ग्राम संगठन ने कई मुद्दों को निपटाया है और सरकारी योजनाओं के माध्यम से, एक सड़क, शौचालयों और घरों के निर्माण गांव में कराए हैं। उन्होंने अपने बच्चों को स्कूल भेजना शुरू कर दिया है। किसानों को बेहतर पैदावार मिलती है। कई किसानों ने आम के पेड़ लगाए हैं, जिससे उन्हें मौसम में अच्छी आय होती है।

कोयले के विरुद्ध एकजुट

यह गांव गोड्डा जिले में पड़ता है और जमीन कोयले के भंडार से समृद्ध है। एक कोयला खनन कंपनी इस क्षेत्र में तीन दशकों से अधिक समय से सक्रिय है। इन खदानों के विरुद्ध जो ग्रामीण आवाज उठाते हैं, उन्हें अक्सर धमकियाँ मिलती हैं। कंपनी ने स्थानीय नेताओं के साथ सांठगांठ करके और पुरुषों को गाड़ियों जैसे बहुत महंगे उपहार की रिश्वत देकर, गाँव की ज़मीन के अतिक्रमण या अधिग्रहण की अनगिनत कोशिशें की हैं।

रामपुर गाँव के नजदीक कोयला ढोते हुए ट्रक (छायाकार – कैलाश कोकरे)

लेकिन नियमित संवाद और ग्राम संगठन की बैठकों ने ग्रामवासियों को, खनन कंपनी की कोशिशों के विरुद्ध एकजुट रहने के लिए एक अच्छा मंच प्रदान किया। ग्रामवासियों ने खनन कंपनी को मांगों की एक सूची दी है, जिन्हें पुनर्वास से पहले उन्हें पूरा करना चाहिए।

रामपुर के निवासी अपनी ज़मीन तब तक नहीं छोड़ना चाहते, जब तक कोयला कंपनी उन्हें उचित मुआवजा नहीं दे देती। वे अपनी जमीन के बदले एक अच्छी कृषि भूमि और कंपनी में नौकरी चाहते हैं।

जारी संघर्ष

संघर्ष तब शुरू हुआ, जब कोयले के भंडार का पता लगाने के बाद, खनन कंपनी खेती की जमीन कब्जे में लेना चाहती थी। ग्रामवासियों ने स्थानीय अधिकारियों के साथ-साथ, ब्लॉक और जिला स्तर के सरकारी अधिकारियों को भी लिखा, लेकिन उनकी शिकायतों पर कार्रवाई की उनसे कोई उम्मीद नहीं है।

जिन परिवारों के पास दो हेक्टेयर से अधिक भूमि है, कंपनी उन्हें नौकरी देती तो है, लेकिन भूमि का दस्तावेजीकरण और परिवार में बंटवारा ठीक से नहीं किया गया है। यह मुआवजे के रूप में पुनर्वास स्थल पर मकान के साथ-साथ पैसे भी देती है।

लेकिन, रामपुर के निवासियों ने अपने रिश्तेदारों और आस-पास के गाँवों के निवासियों का पुनर्वास देखा है। उनका मत है कि उन ग्रामीणों का पुनर्वास ठीक से नहीं हुआ है, और वे नहीं चाहते कि उनके और उनकी आने वाली पीढ़ियों के साथ भी ऐसा ही हो। एक ग्रामवासी, सोनोती ने कहा – “हमारी जमीन का कोई विकल्प नहीं हो सकता। हम इसे क्यों दें? बदले में हमें कुछ नहीं मिल रहा है।”

जब भी को अजीब गतिविधि होती है या उनके गांव में कोई नया व्यक्ति आता है, तो ग्रामवासी संदेह करते हैं। ग्रामवासियों का कहना है कि कंपनी के एजेंट गाँव में रहने वालों और काम के लिए पलायन कर चुके युवाओं के बीच विभाजन और टकराव पैदा कर रहे हैं। इस मुद्दे को अदालत में ले जाया गया है। ग्रामवासियों का कहना है कि वे केवल शांति चाहते हैं।

पिछले पांच वर्षों में मॉनसून अनियमित रहा है और किसानों की कोई तरक्की नहीं हुई है। गांव का जल स्तर नीचे चला गया है। पानी में भी कोयले का स्वाद रहता है। हालांकि ग्राम संगठन के तत्वावधान में ग्रामवासियों ने कई समस्याओं पर काम किया है, लेकिन भविष्य अनिश्चित होने के कारण वे बेचैन हैं, क्योंकि कोयला खनन की गतिविधियां अभी जारी हैं।

कोयला कंपनी ने कुछ किसानों की जमीन पर अतिक्रमण किया है जहां आम के पेड़ लगाए गए हैं। खदान के गांव की सीमा के पास होने के कारण, कृषि भूमि धीरे-धीरे कम हो रही है। पुनर्वास प्रक्रिया को लेकर हितधारकों और आशंकित ग्रामवासियों के बीच संघर्ष को निपटाने की आवश्यकता है। फिर भी ग्रामवासियों की बेहतर कल की उम्मीद बनी हुई है।

(* गोपनीयता बनाए रखने के लिए गांव और निवासियों के नाम बदल दिए गए हैं)

कैलाश कोकरे पुणे के विकास अण्वेष फाउंडेशन में एक रिसर्च इंटर्न हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।

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