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गंजिफा कार्ड्स

कारीगर, नए अवतार में दशावतार कार्ड की कला को जीवित रखते हैं

हालांकि आधुनिक मनोरंजन ने दशावतार कार्ड गेम को हाशिये पर धकेल दिया है, बिश्नुपुर में फौजदार परिवार ने सम्राट अकबर के समय से प्रचलित कला के निर्वाह को सुनिश्चित करने के लिए अनुकूलित किया है।

शीतल फौजदार दशावतार कार्ड बनाने की खानदानी परंपरा को जारी रखते हैं, एक सदियों पुराना पत्तों का खेल, जिसे कभी शाही संरक्षण प्राप्त था (छायाकार-गुरविंदर सिंह)

पश्चिम बंगाल के बांकुरा जिले के बिष्णुपुर के रहने वाले शीतल फौजदार (48), गत्ते के कार्डों पर भगवान विष्णु के अलग-अलग अवतार बनाने में व्यस्त थे। उनके परिवार के दो सदस्य उनकी सहायता कर रहे थे। शीतल फौजदार उन चंद सक्रिय कारीगरों में से हैं, जो दशावतार कार्ड, जिन्हें गंजीफा कार्ड के नाम से जाना जाता है, बनाने की कला में माहिर हैं।

उनके घर के बाहर साइनबोर्ड, जो संखारी बाजार, मनसाटोला की एक दूकान पर भी लगा है, पर लिखा है: “हाउस ऑफ़ क्वालिटी दशावतार कार्ड एंड नक़श कार्ड। बिष्णुपुर राजवंश की एक प्राचीन पारंपरिक हस्तकला।”

जैसा कि नाम से पता चलता है, दशावतार (या दशाबतार) कार्ड, ताश जैसा एक खेल है, जिसमें हिन्दू भगवान, विष्णु के दस अवतारों को कार्डों पर दर्शाया गया है। कार्ड का यह खेल कभी बिष्णुपुर और बंगाल के दूसरे हिस्सों में रहने वाले लोगों लिए समय गुजारने का पसंदीदा खेल था।

लेकिन बदलते समय और मनोरंजन के आधुनिक साधनों ने इस खेल को हाशिये पर पहुंचा दिया। फिर भी अन्य सजावटी वस्तुओं पर पेंटिंग पद्धति के बदलावों को अपनाकर और पत्तों की संख्या कम करके, इससे जुड़े फौजदार परिवार और सरकार ने इस खेल को जिन्दा रखा है।

प्राचीन ताश का खेल

अब केवल फ़ौज़दार खानदान के लोग रह गए हैं, जो गंजिफ़ा कार्ड बनाते हैं। शीतल फ़ौज़दार दावा करते हैं कि जब से दशावतार कार्ड के खेल की शुरुआत हुई थी, तब से इसे बनाने वाले खानदान की वे 87वीं पीढ़ी हैं। इसकी शुरुआत बीर हम्बीर के शासनकाल में हुई थी, जो 1592 में बिष्णुपुर के राजा बने थे। उन्होंने VillageSquare.in को बताया, “हमारे पूर्वज तब से कार्ड बना रहे हैं, जब मल्ल राजाओं ने इस क्षेत्र पर शासन किया।”

लेकिन कुछ भारतीय विद्वानों के अनुसार इस खेल का जन्म उससे भी पहले के युग में हुआ था। प्रसिद्ध विद्वान हरप्रसाद शास्त्री ने 1895 में ‘एशियाटिक’ पत्रिका में उल्लेख किया, कि इस खेल की उत्पत्ति 8वीं शताब्दी में हुई थी।

शोधकर्ताओं का मानना ​​है कि इस खेल की शुरुआत 16 वीं शताब्दी में बिशुनपुर के मल्ल वंश के 49वें शासक बीर हम्बीर के शासन के दौरान बांकुरा में हुई थी, जो शीतल फौजदार के दावों को सही साबित करता है। हम्बीर कला, शिल्प और साहित्य के महान संरक्षक थे।

अकबर के दरबार के खेल से अपनाया गया  

कोलकाता के बिधाननगर कॉलेज में एंथ्रोपोलॉजी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर, कौशिक भट्टाचार्य के अनुसार – “बीर हम्बीर के, राजा अकबर के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध थे और वह अक्सर उनसे मिलने जाते थे। अकबर के दरबार में खेले जाने वाले ताश के खेल, गंजीफा ने उन्हें प्रभावित किया।”

शिखा फौजदार हाथ से बनाए दशावतार कार्ड दिखाती हैं, जिसे बिष्णुपुर में उनका परिवार बनाता है (छायाकार- गुरविंदर सिंह)

फौजदार शब्द एक सैन्य उपाधि का प्रतीक है। शीतल फौजदार बता ते हैं – “स्थानीय राजा हमें हमारे राजस्थान के मूल निवास से दुश्मन राजाओं से लड़ने के लिए यहां लेकर आए। राजा हम्बीर ने एक फौजदार की प्रतिभा को पहचान लिया, जो युद्ध की बजाए कला और संस्कृति में ज्यादा रुचि रखता था, और उसे दशावतार कार्ड बनाने की जिम्मेदारी दे दी। परिवार पीढ़ियों से इस परंपरा को जारी रखे हुए है।”

भट्टाचार्य ने VillageSquare.in को बताया – “राजा हम्बीर ने देवी और देवताओं को ताश के इस खेल का विषय बनाया। कला के प्रति झुकाव के कारण फौजदार परिवार के एक सदस्य ने भगवान विष्णु के दस अवतारों के आधार पर कार्ड तैयार किए।”

भट्टाचार्य बताते हैं – “आठ-सूट पैक में 96 कार्ड वाले मुगल गंजिफा के बारे में विस्तृत ब्यौरा अबुल फजल के ‘ऐन-ए-अकबरी’ में मिलता है। फौजदारों ने कुछ नवाचार करते हुए, कार्ड की संख्या 120 तक बढ़ा दी। खेल में पांच खिलाड़ी होते थे।”

कार्ड बनाने की प्रक्रिया

कार्ड कपड़े, स्टार्च, पेंट और रोगन के साथ बनाए जाते हैं। शिखा फौजदार (25) ने VillageSquare.in को बताया – “पहले, कपड़े के टुकड़े को मोड़ा जाता है और इमली के बीज से बने गोंद से चिपकाया जाता है। इसके सूखने के बाद इसपर चाक के चूरे की एक परत चढ़ाई जाती है। इसके बाद दोनों किनारों को एक चिकने पत्थर के साथ बराबर करके ढाई इंच के व्यास के साथ गोल आकार में कार्ड को काट लिया जाता है| इसके बाद दस अवतार – अर्थात मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध (शंख) और कल्कि – कार्डों पर पेंट कर दिए जाते हैं|”

लुप्त होता बाजार

लेकिन कारीगरों को दुःख ​​है कि दशावतार कार्ड के लिए बाज़ार में कोई मांग नहीं है। शीतल फौजदार के बड़े भाई सुबल फौजदार के अनुसार – “पहले खरीदार दूर दराज के इलाकों से कार्ड खरीदने के लिए आते थे। हमें अग्रिम भुगतान भी किया जाता था और ऑर्डर पूरा होने में कई महीने लग जाते थे।”

सुबल फौजदार ने VillageSquare.in को बताते हैं – “लेकिन समय बदल गया है। अब हम एक साल में दशावतार कार्ड के मुश्किल से पांच से सात पैक बेच पाते हैं। लोग इनके बारे में लगभग भूल चुके हैं।” फ़ौज़दार परिवार ने कुछ साल पहले कार्डों की बिक्री ख़त्म हो जाने के कारण आर्थिक रूप से सबसे बुरा वक्त देखा था।

गुजारे के लिए नवाचार

फ़ौज़दार भाइयों को विचार आया कि भगवान विष्णु के प्रत्येक अवतार के 10 कार्ड के अलग-अलग पैक बनाकर बेचे जाएं, बजाय पूरा बण्डल बनाने के, जिसके लिए कोई खरीददार नहीं हैं। सुबल फौजदार के अनुसार – “हमें एहसास हुआ कि लोगों की अब कार्ड के खेल में कोई दिलचस्पी नहीं है, लेकिन हो सकता है वे सजावटी सामान के रूप में कार्ड खरीदना पसंद करें।”

कला को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से, भगवान विष्णु के दशावतारों में से एक अवतार को एक लालटेन पर चित्रित किया जा रहा है (छायाकार-गुरविंदर सिंह)

उन्होंने हर अवतार के लिए 10 कार्ड का एक पैकेट बनाया। सुबल फौजदार बताते हैं – “लोगों ने रुचि दिखाई। हमें बंगाल भर के दुकानदारों से आर्डर मिलने लगे और यहां तक ​​कि राज्य सरकार द्वारा संचालित हस्तशिल्प, “बिश्वा बंगला” की दुकानों से भी ऑर्डर मिलने शुरू हो गए।”

उन्होंने कहा कि गंजीफा कार्ड के आकर्षण ख़त्म होने का एक कारण इसका महंगा होना भी था। उनके अनुसार – “120 कार्ड के एक पैक की कीमत 25,000 से 30,000 रुपये तक होती है, क्योंकि इसे बनाने में विभिन्न चरणों में लगे छह लोगों को कम से कम एक महीने का समय लगता है। दस कार्ड के छोटे पैक की कीमत लगभग 2,000 रुपये होती है, और कला प्रेमी उसे खरीद सकते हैं।”

फौजदारों ने पारंपरिक कला को जीवित रखने के उद्देश्य से दशावतार कार्ड के विषय पर दुर्गा पूजा के पंडाल भी बनाए हैं। यहां तक ​​कि इस प्राचीन हस्तशिल्प के लिए नए बाजार पैदा करने के लिए उन्होंने विचित्र लालटेन पर भगवान विष्णु के अवतारों को चित्रित किया है। 

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कला को जीवित रखना

परिवार की युवा पीढ़ी की पारंपरिक कला को जारी रखने में दिलचस्पी नहीं है। शीतल फौजदार के भतीजे संदीप (22) कहते हैं – “ये कड़ी मेहनत मांगती है और इसके परिणाम मेहनत के अनुसार नहीं मिलते। मैंने कार्ड बनाना सीखा है, लेकिन इस धंधे की बजाए मैं नौकरी करना पसंद करूंगा।”

फ़ौज़दार बंधुओं को अफ़सोस है कि यदि इसके अस्तित्व को बचाने के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए, तो उनके बाद यह कला विलुप्त हो जाएगी। शीतल फौजदार कहते हैं – “यह धारणा गलत है कि हम कार्ड बनाने की विधि को गुप्त रखना चाहते हैं। उल्टा हमने तो बुनियादी ढांचे के लिए सरकार से अनुरोध किया था, जहां हम उन युवाओं का मार्गदर्शन कर सकें, जो इस कला को सीखना चाहते हैं।”

वे कहते हैं – “हम इस कला को जीवित रखना चाहते हैं, लेकिन सरकार से ही समर्थन नहीं मिलता। हमने सरकार से एक आर्ट गैलरी के लिए जमीन देने का भी अनुरोध किया है, जहां ये शानदार कार्ड देखने और सीखने के लिए प्रदर्शित किए जा सकें, लेकिन कुछ भी नहीं हुआ। ”

लेकिन प्रशासन ने ढिलाई के आरोपों से इनकार किया। बिष्णुपुर के उप-मंडल अधिकारी मानस मंडल ने VillageSquare.in को बताया – “सरकार कला को एक नए रूप में पेश करके इसे जीवित रखने की कोशिश कर रही है। हम कारीगरों को लालटेन और गहनों पर पेंट करने के लिए प्रशिक्षित करते हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि इससे उन्हें आजीविका मिल सके और कला भी फीकी न पड़े।”

गुरविंदर सिंह कोलकाता स्थित पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।

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