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लौटे प्रवासी

लौटे प्रवासी: निराशा और सामंजस्य

काम के स्थान (शहर) की दूरी, नियोक्ता (मालिक) की नौकरी देने की प्रतिबद्धता और मूल गाँव में आजीविका के अवसर, लौट कर आए प्रवासियों के फैसले का आधार हैं, कि वे लॉकडाउन समाप्ति के बाद प्रवास करें या नहीं। तब तक वे उपलब्ध संसाधनों से ही सामंजस्य बैठाते हैं

चिरांग में अपने खेत में काम करते दिख रहे जगेंद्र राजभोंसी जैसे कई लौटकर आए प्रवासियों के लिए, आजीविका की कोई स्थानीय संभावनाएं नहीं है (फोटो: यापी कोप के सौजन्य से)

मेरे सहकर्मियों और सहयोगियों ने कई प्रवासियों से मुलाकात की और उनसे उनके अनुभव, कष्ट, वर्तमान स्थिति और भविष्य की योजनाओं के बारे में बात की। इस लेख में हम, कुछ लौटे प्रवासियों द्वारा बताई गई स्थितियों और अनुभवों का स्वरूप प्रस्तुत कर रहे हैं।

क्योंकि लाखों प्रवासी मजदूर, अनिश्चित समय के लिए अपने गांवों में लौट आए हैं, इसलिए उनके पास मौजूदा अनुभवों और हालात का दायरा बहुत व्यापक होना चाहिए। इसलिए हम दावा नहीं करते कि यह स्वरूप इन सबका प्रतिनिधित्व करेंगे ही।

हमारा उद्देश्य लौटकर आए प्रवासियों के अनुभवों का एक विस्तृत दायरा पेश करना है, जो बेहतर कमाई के उनके सपने को COVID-19 द्वारा ठोकर मारने, और उनके मेजबान कस्बों और शहरों द्वारा बेपरवाह तरीके से त्याग देने के कारण उन्हें सहने पड़े। 

पढ़ें: लौटे प्रवासी: एक विराम या एक सपने का अंत?

वापसी की अनिच्छा

बिक्रम सरमा 22 साल का एक नौजवान है। वह एक किसान परिवार से आता है और उनका एक पुराना घर है, जिससे लगती हुई कुछ जमीन है। उन्होंने स्थानीय स्कूल में नौवीं कक्षा तक पढ़ाई की। चार साल पहले, उन्होंने एक स्थानीय एजेंसी से संपर्क किया, जिसने उसे सिक्योरिटी गार्ड का प्रशिक्षण दिया। एजेंसी ने उसे हैदराबाद भेज दिया, जहां उन्होंने एक आवासीय सोसायटी में सिक्योरिटी गार्ड के रूप में काम किया।

लॉकडाउन के बाद, मई के अंत में वह एक श्रमिक ट्रेन से वापिस आ गया। नौकरी देने वाले, नियोक्ता ने उनकी और दूसरे स्थानों से आए सहकर्मियों को उनके रहने के स्थान पर बने रहने के लिए कोई कोशिश नहीं की| नियोक्ता ने शहर में लॉकडाउन होने पर उन्हें राशन दिलवाने में भी मदद नहीं की।

सौभाग्य से, उसके नियोक्ता ने उसकी बकाया राशि का भुगतान कर दिया, जिससे सरमा अपनी बचत अपने साथ वापस ला सके। वह तब से अपने माता-पिता के साथ अपनी जमीन पर काम कर रहा है। हालाँकि उसका नियोक्ता चाहता है कि हालात सुधरने पर वह वापस हैदराबाद चला आए, लेकिन सरमा जाने के लिए इच्छुक नहीं है। नियोक्ता न तो रोजगार की शर्तों में कोई बदलाव करना चाह रहा है और न ही घर या भोजन की कोई सुरक्षा प्रदान करना।

सरमा और उसके माता-पिता को चिंता है कि स्थिति की पुनरावृत्ति न हो जाए, जिससे उसे एक दुखदाई शहर में फंस जाने, कष्टदायक यात्रा और जोखिम की विकटता का फिर से सामना करना पड़े। इसलिए सरमा ने अपने खेत में सुपारी के पेड़ लगाने का फैसला किया है। जब तक पेड़ बड़े नहीं हो जाते, तब तक उसकी पड़ोसियों के खेतों में काम करने की योजना है। वह वापिस नहीं जाना चाहता।

दुविधा 

बिस्वनाथ बोरो एक 24 वर्षीय अविवाहित युवक है, जिसने कक्षा वी तक की पढ़ाई की है। लंबे समय से वह प्लाईवुड निर्माताओं को बिक्री के लिए, लकड़ी का पाउडर बनाने वाली एक फैक्ट्री में काम कर रहा है। वह अपने घर से 30 किमी दूर गुवाहाटी के पास एक जगह पर काम करता था।

वह फैक्ट्री के परिसर में दोस्तों और सहकर्मियों के साथ रह रहा था। जब लॉकडाउन की घोषणा की गई थी, तो फैक्ट्री को बंद करना पड़ा। मालिक ने उनके बकाया का भुगतान किया और अप्रैल की शुरुआत में उन्हें वापिस भेज दिया। वह बिना ज्यादा परेशानी के घर लौट आया।

बोरो अपने माता-पिता के साथ अपने खेत पर जरूरत के अनुसार काम कर रहा है। उसने अपने नियोक्ता से संपर्क बना कर रखा है। नियोक्ता ने उससे तीन या चार बार बात की है और काम शुरू होने पर उसे वापस लेने की इच्छा व्यक्त की है। बोरो फिर से कारखाने के परिसर में रह सकता है, इसलिए आवास उसके लिए कोई समस्या नहीं है।

बोरो दुविधा में है। एक तरफ, घर पर रहने पर सुरक्षा का अहसास रहता है, और दूसरी तरफ, उन्हें पैसे की जरूरत भी है, जो वह फैक्ट्री में कमाएगा। हालाँकि वह अब तक दुविधा में है, लेकिन इस बात की काफी संभावना है कि वह काम पर लौटेगा।

अनिश्चितताएं 

चालीस वर्ष से कुछ ऊपर उम्र  वाले जगेंद्र राजभोंसी, चिरांग जिले में रहते हैं। उसे अपने पांच सदस्यों के परिवार पालना है। उनका गाँव एक वनक्षेत्र के करीब है। खेत की ज़मीन पर हाथी का हमला यहाँ एक आम घटना है। खेती से होने वाली आमदनी की कमी पूरी करने के लिए वह केरल प्रवास कर गए थे।

वह अब वापस आ गए हैं और आम वर्षों की तुलना में केवल सीमित मात्रा में धन ला सके हैं। वह अब फंस गए हैं। उन्हें अपने परिवार के लिए कमाने की जरूरत है। वह कहते हैं – “ऐसे हम कब तक चला सकते  हैं? मैं  कभी-कभी अपनी थोड़ी सी जमीन में सब्जियां उगाने के लिए काम करता हूं। लेकिन ये तो घर पर खाने के लिए  लग जाएगा| और हाथी के खतरे को देखते हुए धान की खेती बहुत अनिश्चित है।”

उन्हें प्रवास पर तो जाना ही होगा और कहीं काम करना होगा| लेकिन उन्हें अपनी केरल वापसी के खर्चे तक की चिंता है, क्योंकि अब काम और आवास के साथ-साथ ऐसे दूर स्थानों की यात्रा के लिए माहौल भी अनिश्चित है।

जगेंद्र अपने ही गाँव के सुरेंद्र को जानता है, जो अपने काम के स्थान से लौट आया है, और अब उसके पास कोई काम नहीं है। सुरेंद्र के परिवार को रोज के भोजन की संख्या में कटौती करनी पड़ी, और यह भी पता नहीं कि उन्हें कब तक दो वक्त का भोजन भी मिलेगा। स्थानीय चर्च और मुफ्त राशन से उन्हें मदद मिलती है, लेकिन अनाज के अलावा भी दूसरे खर्चे हैं।

अपना (मूल) गांव बनाम मेजबान शहर

पश्चिम की ओर चलते हैं| इंदौर से लगभग 140 किलोमीटर दूर एक बड़े गाँव के रहने वाले रमेश ने शहर में व्यावसायिक तौर पर पेंटर का काम करता था। उसका नियोक्ता, उन ग्राहकों के लिए दीवार-पेंटिंग करवाता था, जो उसे विज्ञापन के रूप में इस्तेमाल करते थे। जब लॉकडाउन लागू हुआ, तो उसके नियोक्ता ने उन्हें बाहर नहीं निकाला, बल्कि उसे और उसके कई सहकर्मियों को रहने के लिए एक छोटा कमरा दे दिया। रमेश 45 दिनों तक वहां रहा, लेकिन फिर अपने परिवार के साथ रहने के लिए बेताब हो गया।

क्योंकि इंदौर एक रेड जोन शहर था, इसलिए पूरा लॉकडाउन कर दिया गया था और इसके बाहर या अंदर यातायात संभव नहीं था। आखिर, उसने अपने मालिक से अपनी कमाई में से 800 रूपए देकर एक साइकिल ली, और लगभग 2500 रुपये लेकर साइकिल से वापिस आया, डरते-डरते कि कहीं पुलिस उसे कानून तोड़ने के लिए पकड़कर सजा न दे।

पहुंचने के बाद, वह अब अपनी मामूली बचत से ही चार बच्चों और पत्नी के परिवार के साथ गुजारा कर रहा है। उसके पास कोई जमीन नहीं है। उसकी पत्नी गांव में घरेलू कामकाज करती है। कुल मिलाकर, वे छह जन 80,000 रुपये की वार्षिक आमदनी के सहारे जीवन यापन कर लेते थे।

अब उस आमदनी का एक बड़ा हिस्सा समाप्त हो गया है, क्योंकि उसे अभी भी कुछ समय के लिए अपना नियमित काम शुरू होने की कोई उम्मीद नहीं है। वह छोटे मोटे कुछ पेंटिंग के काम करके अपनी पत्नी की कमाई में हाथ बनता लेता है। वह मौका मिलते ही वापस जाएगा।

प्रवास के लिए उत्सुकता

और आगे पश्चिम से हमारे पास झाबुआ जिले के अजयसिंह भिलाला की कहानी है। वह और उनकी पत्नी अजमेर के पास एक नमक बनाने वाली फैक्ट्री में काम करते थे। दोनों मिलकर रोज लगभग 700 रुपये कमा लेते थे। साथ ही फैक्ट्री मालिक ने उन्हें रहने के लिए जगह भी दे रखी थी।

लेकिन जब लॉकडाउन लागू हुआ, तो कारखाना बंद हो गया और उनकी नौकरी चली गई। इसलिए उन्होंने 10-10 लोगों के समूहों में टैक्सी किराए पर लेकर अपने गांव वापिस पहुंचे, इस डर के साथ कि 500 किमी की उनकी यात्रा में कहीं उन्हें रोक न दिया जाए।

भिलाला परिवार के पास थोड़ी सी जमीन है जिसमें वे मॉनसून में केवल मक्का और थोड़ा कपास उगा सकते हैं। एक पूरे सीजन में, उन्हें इन फसलों से 20,000 रुपये से अधिक कमाई नहीं होती और इसके अलावा और कुछ नहीं है, जिससे वे अपना गुजारा कर सकें। इसलिए वे वापस जाने के लिए बेताब हैं, और उनका मालिक भी उन्हें जल्द से जल्द वापिस लेने के लिए उत्सुक है। जैसे ही उनके खेत का काम खत्म हो जाएगा, वे वापिस लौट जाएंगे|

लॉकडाउन के बाद प्रवास

इन रुझानों से हम तीन चीजें साफ-साफ देखते हैं। जो लोग लंबी दूरी पर प्रवास पर गए थे, उन्हें अपने प्रवासी जीवन को फिर से शुरू करने में बहुत अधिक हिचक है। उनके पास यात्रा के लिए पैसा नहीं है| उनके कुछ कमजोर से संपर्क हैं, जिनकी बातों पर वे ज्यादा भरोसा नहीं कर सकते और उन शहरों में उनका कोई सामाजिक आधार नहीं है।

दूसरी ओर, जो नजदीकी कस्बों और शहरों में काम करने जाते थे, उनके लिए अपने काम पर लौटना आसान है और वे खरीफ के आमतौर के कामों से निपटने के तुरंत बाद लौटना चाहते हैं। लेकिन इन मामलों में से किसी में ऐसा नजर नहीं आता, कि ये लौटकर आए प्रवासी अपने गांव में अपनी आजीविका के लिए उसी कौशल का उपयोग कर सकते हैं, जिसे वे उस शहर में करते थे, जहाँ से वे अब लौट आए हैं।

गोपनीयता की दृष्टि से व्यक्तियों और स्थानों के नाम बदल दिए गए हैं।

(कामरूप से मार्टिन राभा, चिरांग से यापी कोप और चंदन सरमा, झाबुआ से संजना कौशिक और इंदौर से बिकाश से प्राप्त इनपुट्स के साथ)

संजीव फंसालकर पुणे के विकास अण्वेषफाउंडेशन के निदेशक हैं। वह पहले ग्रामीण प्रबंधन संस्थान आणंद (IRMA) में प्रोफेसर थे। फंसालकर भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) अहमदाबाद से एक फेलो हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।

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