मराठवाड़ा के सूखे के बीच उम्मीद के अंगूर-बाग़
August 6, 2020
आदिवासी क्षेत्रों के लिए दूध उत्पादन में बहुत बड़ी संभावनाएं मौजूद हैं
August 11, 2020
COVID-पश्चात विकास

बहु-आयामी योजना से मिलेगी पूर्वोत्तर में टिकाऊ अर्थव्यवस्था बनाने में मदद

अपनी गत समय की सामाजिक अस्थिरता और आजीविका अवसरों की कमी के कारण विकास में पिछड़ गया। महामारी से क्षेत्र को एक नई अर्थव्यवस्था विकसित करने का अवसर मिला है

COVID-19 और लॉकडाउन के प्रभाव से पैदा हुई हैं, अनेक समस्याएं और संभावनाएं (thefederal.com के सौजन्य से )

COVID-19 का प्रभाव निकट भविष्य में बना रहने की आशंका है। चूंकि लॉकडाउन में नेटवर्क और आपूर्ति श्रृंखलाएं रातोंरात ध्वस्त हो गए थे और अब एक नए सामान्य की ओर धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं, एक बुनियादी सवाल अभी भी सामने है, जिसका उत्तर ढूंढना होगा: इन नए हालात में, समुदाय समृद्धि और स्थिरता को ध्यान में रखकर अपने आप को कैसे व्यवस्थित करते हैं? उत्तर आसान नहीं हैं, विशेष रूप से पर्यावरण की दृष्टि से नाजुक भोगौलिक परिस्थितियों के लिए, जो बुनियादी अस्तित्व के लिए बहुत हद तक बाहरी व्यापार और पलायन पर निर्भर हैं।

भारत के पूर्वोत्तर में भोगौलिक स्थिति ऐसी ही है। यह दुनिया के सबसे जटिलता और विविधता वाले क्षेत्रों में से एक है, जो दूसरों के साथ-साथ, 140 से अधिक आदिवासी समुदायों का घर है। हिमालय पर्वत श्रृंखला से लेकर बाढ़ के मैदानी इलाकों तक, इस क्षेत्र में कई पर्यावरणीय आवास हैं, जिनमें वनस्पति और जीवों की समृद्ध विविधता पाई जाती है। यहां 170.4 लाख हेक्टेयर का लगभग 66% क्षेत्र वन से ढका है।

आठ राज्यों में फैले और अक्सर दूरदराज और/या पहाड़ी इलाकों में, 70% से अधिक यानि लगभग 3 करोड़ लोग यहां गांवों में रहते हैं। कोई भी राज्य कृषि में आत्मनिर्भर नहीं है। ज्यादातर परिवार बहुत छोटे किसान या भूमिहीन हैं। पूर्वोत्तर की 59% ग्रामीण आबादी भूमिहीन है और उसमें से 39% अस्थाई मजदूरी पर निर्भर है।

ग्रामीण परिवारों में दो हेक्टेयर से कम भूमि वाले, यानि छोटे, किसानों का अनुपात राष्ट्रीय-स्तर के 59% के मुकाबले, अरुणाचल प्रदेश में 65% से लेकर नागालैंड और मणिपुर में 84% के बीच है। असम और त्रिपुरा के लिए, यह अनुपात क्रमशः 62% और 80% है। इसके अतिरिक्त, क्षेत्र में उग्रवाद और जातीय संघर्ष के कारण लंबे समय तक अस्थिरता बनी रही है।

कुछ सत्व-निकालने वाले और चाय जैसे पारंपरिक उद्योग को छोड़कर, यहां बहुत कम औद्योगिक विकास हुआ है, जिसके कारण मिजोरम को छोड़ दें, तो गरीबी की दर भारत के बाकी हिस्सों के मुकाबले अधिक है। खेती, पशुपालन, वन उपज, अस्थाई मजदूरी और प्रवासियों से आने वाले धन, छोटे व्यापार और सरकारी सामाजिक सुरक्षा योजनाएं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था के इंजन को चालू रखती हैं। प्रवासियों के विभिन्न राज्यों और इस क्षेत्र के दूसरे इलाकों से लौट आने के कारण उपलब्ध मजदूरों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था अवरुद्ध हो रही है।

पहले से ही कमजोर, कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था जर्जर हालत में है। आमदनी के स्रोतों के सिकुड़ जाने से, आखिरकार समुदायों द्वारा वन संसाधनों के अधिक दोहन का दबाव बढ़ेगा। इसके अलावा, पिछले 10 वर्षों में अपेक्षाकृत स्थिरता के बाद, उत्तरपूर्वी अर्थव्यवस्था अब उस उग्रवाद और जातीय संघर्ष को झेलने की स्थिति में नहीं है, जिसने कई दशकों तक इस क्षेत्र की प्रगति को रोक दिया था।

इस पृष्ठभूमि के साथ, विकास कार्यकर्ताओं, सरकारी अधिकारियों, पंचायत प्रतिनिधियों, समुदाय के नेताओं और शिक्षाविदों के साथ न सिर्फ इस संकट उबरने, बल्कि समुदायों को टिकाऊ और आत्म-निर्भर बनाने के लिए विचार विमर्श करने के उद्देश्य से, सलाह-मशवरे की एक श्रृंखला आयोजित की गई। इनके आधार पर, दिशा-निर्देश तय किए गए हैं।

सामाजिक पूंजी

‘आशा’ कार्यकर्ताओं, सहायक नर्सिंग दाई (एएनएम), पंचायत प्रमुख, स्वयं सहायता समूह के सदस्यों और युवाओं को लेकर एक प्रतिक्रिया समूह का गठन हर पंचायत में होगा, जो जरूरत पड़ने पर तुरंत कदम उठाए। इन सदस्यों को समुदाय में संक्रमण, क्वारंटाइन और ठीक हुए मरीजों को समुदाय की मुख्यधारा से जोड़ने जैसे कार्य निपटाने के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा।

प्रभावी तरीके से कार्य करने के लिए, सदस्यों को नियमित रूप से COVID -19 के बारे में अपडेट किया जाएगा। क्वारंटाइन सेंटर, असुरक्षित ग्रामवासियों, डॉक्टरों और नर्सों के डेटाबेस तैयार किया जाएगा, और किसी ग्रामवासी के संक्रमित होने की स्थिति में प्रतिक्रिया समूह को तत्काल कदम उठाना होगा।

पूर्वोत्तर के ग्रामीण क्षेत्रों की अपार सामाजिक पूंजी की बदौलत, समुदायों को लॉकडाउन के प्रभाव का सामना करने में मदद मिली। पंचायतों, समुदाय के नेताओं, महिलाओं के समूहों और प्रशासनिक खण्ड के अधिकारियों ने सुनिश्चित किया, कि एकदम हाशिए पर जीवन जीने वाले लोगों को भी राहत का लाभ मिले।

अब विभिन्न हितधारकों के साथ काम करने के लिए, सभी स्तरों पर नेतृत्व के क्षमता निर्माण के माध्यम से, इस सामाजिक पूंजी को और मजबूत करने की आवश्यकता है। समुदायों को टिकाऊ बनाने के लिए ग्रामीण आधारभूत ढांचे का निर्माण, कृषि पैदावार में वृद्धि, आजीविका विविधीकरण, सूक्ष्म उद्यमिता को बढ़ावा देने और बाजार-संपर्क पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

भोजन की पर्याप्तता

कुल मिलाकर, इस क्षेत्र में कृषि उत्पादन कम है और बाहरी सहयोग पर निर्भर है। कृषि में, उसी बीज के बार बार प्रयोग के कारण, उत्पादकता कम हो गई है। सामुदायिक सेवा संगठनों और पंचायतों के साथ साथ, सम्बंधित विभाग को इस मुद्दे पर बड़े पैमाने पर काम करना चाहिए।

इस क्षेत्र में सूअर के मांस की वार्षिक मांग, लगभग 8,400 करोड़ रुपये है, जिसका 60% बाहर से आता है। परंपरागत रूप से, समुदाय सूअर पालन करते हैं। यदि अच्छी नस्ल, टीके और चारा सुनिश्चित कर दिए जाएं, तो व्यावसायिक रूप से सुअर पालन फल-फूल सकता है।

इसी तरह, अनुकूल जलवायु के बावजूद, क्षेत्र में दूध की कमी है। यही हाल लहसुन, आलू, फल इत्यादि अन्य वस्तुओं का है। नई तकनीकों को लागू करके और बेहतर सामग्री उपलब्ध करके, इस कमी को दूर किया जा सकता है।

कौशल प्रशिक्षण

पूर्वोत्तर में, लौटकर आने वाले प्रवासी और शिक्षित युवा, पहले से मौजूद और नए कामों, जैसे फ़ूड प्रोसेसिंग, घरेलू मुर्गी पालन, सूअर पालन, मछली पालन, बागवानी और कृषि एवं इससे जुड़े सूक्ष्म उद्यमों में विभिन्न भूमिका निभा सकते हैं।

लौटकर आने वाले युवा प्रवासी टेक्नोलॉजी का सहजता से उपयोग कर सकते हैं। क्षेत्र के संस्थानों, जैसे कि भारतीय उद्यमिता संस्थान (IIE), आईआईएम शिलांग, केंद्रीय और राज्य विश्वविद्यालयों, आईआईटी और एनआईटी, आदि को इन संभावित उद्यमियों के लिए स्थानीय संदर्भ के आधार पर, छोटी अवधि के लिए उपयुक्त व्यावसायिक कोर्स डिजाइन करने चाहिए। वित्तीय संस्थाओं, गैर-सरकारी संगठनों और पंचायतों के समन्वय द्वारा सूक्ष्म-उद्यमियों को ऋण प्राप्त करने में मदद की जा सकती है।

पिछले दशक की क्षेत्र में रही स्थिरता ने लगातार विकास का एक सिलसिला प्रदान किया है, जिसके कारण इस क्षेत्र में निर्माण के क्षेत्र में उछाल आया है। निर्माण के लिए मजदूर ज्यादातर बाहर से आते हैं, जो लॉकडाउन के समय चले गए। मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम में इस खाली स्थान को भरने के लिए स्थानीय लोगों को कुशल बनाने की आवश्यकता है।

आजीविका संवर्धन

पूर्वोत्तर के कई राज्यों में, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MGNREGS) लागू नहीं हो पाई है। इस महामारी में ग्रामीण तालाबों, नहरों, चेक-डैम और मेढ़बंदी जैसे ग्रामीण बुनियादी ढांचे के निर्माण के द्वारा, कार्यक्रम को सुव्यवस्थित करने के भरपूर अवसर हैं।

एक अन्य उपयुक्त निवेश, ‘व्यक्तिगत लाभार्थी योजना’ है, जिसके अंतर्गत परिवारों को भोजन और वस्तुओं के लिए छोटे बुनियादी ढाँचे को बढ़ावा देने के लिए सहायता दी जा सकती है, जिसकी कमी इस क्षेत्र और स्थानीय इलाकों में नियमित रूप से अनुभव की जाती है।

पूर्वोत्तर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में अभाव पैदा करने वाला एक बड़ा कारण यह है, कि आजीविका के मौजूदा स्रोत छोटे हैं, जिनसे सीमित मात्रा में बचत उपलब्ध होती है। इस अतिरिक्त बची हुई वस्तु को ज्यादातर पारंपरिक व्यापारियों के माध्यम से गुजरना पड़ता है, जो लाभ का एक बड़ा हिस्सा अपनी जेब में रखते हैं।

मौजूदा और नए किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) को ‘इकोनॉमी ऑफ़ स्केल’, यानि अधिक मात्रा से आर्थिक लाभ के सिद्धांत के अनुसार, माल इकठ्ठा करने वाले की भूमिका निभाने की आवश्यकता है। एफपीओ को प्रशासन के साथ काम करने की जरूरत है। जहां कस्बे या शहर नजदीक हैं, उन्हें सीधे बिक्री करनी चाहिए।

इस क्षेत्र में कताई और बुनाई ग्रामीण समुदायों के दैनिक जीवन का हिस्सा हैं। बहुत से आदिवासी समुदायों के लिए, यह कला उनके सांस्कृतिक ताने-बाने से जुड़ी हुई है। कला लुप्त होती जा रही है, क्योंकि नई पीढ़ी इस क्षेत्र में मौजूद संभावनाओं के बावजूद, आय की अनिश्चितता के कारण इसमें आने की इच्छुक नहीं है।

एरी और मुगा रेशम की बुनाई को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए। सामाजिक उद्यमिता के रूप में व्यवस्थित प्रयास, प्रौद्योगिकी में सुधार, मूल उत्पादकों के फालतू उत्पादों को एकत्रित करना और आपूर्ति श्रृंखला को सुव्यवस्थित करना, इस क्षेत्र को पुनर्जीवित कर सकता है।

संरक्षण में सुधार

पूर्वोत्तर क्षेत्र एक जैव-विविधता वाला प्रमुख स्थान है और यहाँ पेड़ों का नुकसान देश भर में सबसे अधिक हुआ है। इस जैव विविधता में लगातार गिरावट हुई है, जिससे कई प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा पैदा हो गया है| इंसान और जानवरों के बीच संघर्ष एक सामान्य घटना है।

छोटे अरसे में आर्थिक अवसरों के कम हो जाने के कारण, वनों की अवैध कटाई और अवैध शिकार में वृद्धि हो सकती है। बेहतर सतर्कता, वनों के निकट रहने वाले समुदायों को शिक्षित करने और आजीविका के अवसर पैदा करने से प्रकृति विनाश को और अधिक होने से रोका जा सकता है।

आगे का रास्ता

इस क्षेत्र के कुछ सबसे दुर्गम क्षेत्रों में अपनी गहरी पैठ की बदौलत, सामुदायिक सेवा और गैर-लाभकारी संगठनों के सामने इस संकट में यहां के लोगों की सहायता के लिए कई भूमिकाएं हैं। वे आजीविका, महामारी से निपटने के लिए पंचायतों और समुदायों के प्रशिक्षण के लिए मॉडल विकसित कर सकते हैं, सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए समुदायों का क्षमता-निर्माण कर सकते हैं और राहत और बचाव उपायों के लिए अग्रिम पंक्ति में आकर कार्य कर सकते हैं।

महामारी और उसके बाद के लॉकडाउन के कारण, क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की कमी के साथ साथ खाद्य पदार्थों की बढ़ती महंगाई उजागर हो गई है। आगे बढ़ते हुए, क्षेत्र के भीतर खाद्य आपूर्ति, श्रम और सामग्री के लिए निर्बाध रूप से सहयोग होना चाहिए। यह सुनिश्चित करने के लिए, नार्थ ईस्टर्न कौंसिल (एनईसी) एक सक्रिय भूमिका निभा सकती है।

पूर्वोत्तर के भीतर, जिलों और राज्यों के बीच मजदूरों का काफी आवागमन है। बेहतर तालमेल के साथ, बाहर से मजदूर लाने के जोखिम को कम करते हुए, मजदूरों के अभाव की समस्या से निपटने में मदद मिलेगी। यदि किसानों को अरुणाचल प्रदेश के हालात के बारे में सूचित कर दिया जाता, जहां कि अफ्रीकी स्वाइन बुखार (एएसएफ) सबसे पहले देखा गया था, तो इसके संकट से असम में बेहतर तरीके से निपटा जा सकता था।

कोरोनावायरस के मामलों में वृद्धि से ग्रामीण आजीविकाओं, मौजूदा सीमित स्वास्थ्य सुविधाओं, क्षेत्र की जैव विविधता और सबसे महत्वपूर्ण रूप से समुदायों के बीच संबंधों पर काफी दबाव पड़ेगा। इस संकट से समुदायों को बाहर निकालने और इस नई सामान्य स्थिति में एक टिकाऊ अर्थव्यवस्था के निर्माण के लिए, आठ राज्यों में कई मोर्चों पर, एक विविध अंतर-क्षेत्रीय तालमेल के साथ रणनीतिक भागीदारी समय की मांग है।

चन्दन सरमा ग्रामीण पूर्वोत्तर भारत में समुदायों के सशक्तिकरण के लिए कार्यरत, सेवन सिस्टर्स डेवलपमेंट असिस्टेंस (SeSTA) से जुड़े हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।

Comments are closed.