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ग्रामीण उद्यम

झारखंड के आदिवासी किसान कृषि-आधारित आय कैसे बढ़ाते हैं

मध्य भारतीय आदिवासी क्षेत्र में, किसानों की आय में टिकाऊ वृद्धि के लिए चल रहे कार्यक्रम - “लखपति किसान”, के माध्यम से किसानों ने कृषि-आधारित विभिन्न आजीविकाओं को सफलतापूर्वक अपनाया है

एक पॉलीहाउस नर्सरी में पौध उगाकर, राजेंद्र टुडू न सिर्फ स्वयं एक सफल कृषि-उद्यमी बन गए हैं, बल्कि किसानों को पौध की निरंतर आपूर्ति भी सुनिश्चित कर रहे हैं (छायाकार-ज्योति कानितकर)

झारखंड में हजारीबाग जिले के चुरचू ब्लॉक के नगदी गांव के संथाल आदिवासी किसान, राजेंद्र टुडू नई पीढ़ी के कृषि-उद्यमी हैं। उन्होंने अपनी थोड़ी सी जमीन पर पहले की तरह खेती के साथ-साथ, नर्सरी का व्यवसाय शुरू किया है।

हमें उनके और उनके काम के बारे में संयोग से पता चला। उसी जिले के ओरिया गाँव जाते हुए हमें एक बोर्ड दिखाई पड़ा। अन्य जानकारी के अलावा बोर्ड पर – ‘मिशन 2020: लखपति किसान – स्मार्ट विलेज’, और राजेंद्र टुडू का नाम और फोटो था।

हमारी जिज्ञासा हमें उनकी नर्सरी में ले गई, और जो हमने देखा वह वास्तव में प्रेरणादायक था। क्योंकि हम वहां बिना पूर्व सूचना के पहुँच गए थे, इसलिए राजेंद्र को आमतौर पर शहर से आने वाले आगंतुकों के लिए तैयार उत्तर पहले से सिखाए नहीं गए थे।

वह अपनी नर्सरी में काम कर रहे थे,, जिसे उन्होंने पिछले तीन साल से पाला-पोसा। वहां रोज़मर्रा के कामों में लगे मजदूर, व्यावसायिक यात्रा पर आए एक बीज कंपनी के प्रतिनिधि और कुछ ग्राहक मौजूद थे। हमने जो देखा वह वहां की रोजमर्रा की स्थिति थी, और यहाँ वही प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।

अपने परिवार और बड़े कुटुंब की महिलाएं नारियल का बुरादा साफ़ करने जैसे रोज़मर्रा के कामों में मदद करती हैं (छायाकार-ज्योति कानितकर)

राजेंद्र की कहानी एक व्यक्ति की सिर्फ एक नर्सरी तैयार करने तक की यात्रा नहीं है, बल्कि बहुत से साथी आदिवासी किसानों की आशाओं की भी है।

आय-वृद्धि कार्यक्रम

सोसाइटी फॉर अपलिफ्टमेंट ऑफ़ पीपल्स ऑर्गनाइजेशन एंड रूरल टेक्नोलॉजी (SUPPORT) के शुरुआती संपर्क और इसके बाद कलेक्टिव्स फॉर इंटीग्रेटेड इनिशिएटिव्स (CInI) की टीम के साथ बातचीत ने उन्हें अपने तरीके से एक उद्यमी बनने में मदद की।

राजेंद्र ने कक्षा सात तक पढ़ाई की है। हालांकि, उनकी अब तक की यात्रा ने साबित कर दिया है, कि औपचारिक शिक्षा और स्कूली शिक्षा का जीवन में सफलता और उपलब्धियों से कोई लेना-देना नहीं है।

अन्य संगठनों और सरकार के साथ साझेदारी में, टीमें “लखपति किसान” कार्यक्रम लागू कर रही थी, जिसका उद्देश्य एक लाख आदिवासी किसानों की आजीविका में वृद्धि में सहयोग करना और उनकी वार्षिक आय एक लाख रुपये तक बढ़ाना था। यह कार्यक्रम झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र और गुजरात में लागू किया जा रहा है।

नर्सरी – व्यवसाय

राजेंद्र टुडू ने आसपास के सब्जी उगाने वाले किसानों को बेचने के लिए, एक ग्रीनहाउस में, पौध तैयार करने के लिए नर्सरी से शुरुआत की। यह प्रयास सफल नहीं हुआ। जब पौधे बचे नहीं, तो उन्होंने महसूस किया कि गर्मी के चरम महीनों के दौरान ग्रीनहाउस भी तापमान को एक समान बनाए रखने में सहायक नहीं होता।

SUPPORT और CInI टीमों के मार्गदर्शन, एक्सपोज़र विज़िट और प्रशिक्षण ने, सब्जियों की पौध की नर्सरी तैयार करने का आत्मविश्वास प्रदान किया । किन्तु, 16 मीटर x 18 मीटर में पॉलीहाउस नर्सरी के लिए रु.1.20 लाख के निवेश की जरूरत थी। दुविधा थी, इसमें कूदा जाए या नहीं?

राजेंद्र टुडू, जिनकी सफलता ने दूसरे किसानों को कृषि-उद्यमी बनने के लिए प्रोत्साहित किया, तरबूज, घीया, आदि की पौध तैयार करते हैं (छायाकार-ज्योति कानितकर)

राजेंद्र ने आस्था की छलांग लगाने का फैसला किया। तीन लाख रुपये की आवश्यक राशि का आधा हिस्सा CInI –Tata Trusts कार्यक्रम से अनुदान के रूप में मिला। उन्होंने अपनी बचत से 30,000 रुपये डाले। शेष 1.20 लाख रुपये उन्हें कर्ज के रूप में ‘रंग दे’ से प्राप्त हुए।

हमारी बातचीत के दौरान, राजेंद्र ने गर्व से बताया कि उन्होंने 1.20 लाख रुपये का तीन साल का ऋण (ब्याज के साथ 1.45 लाख रुपये) ढाई साल में चुकता कर दिया!

सहजबुद्धि से उद्यमी

राजेंद्र को अपने व्यापार की समझ है, जिसे शुरू हुए तीन वर्ष हुए हैं। प्रत्येक प्लास्टिक ट्रे में 102 पौधे होते हैं और नर्सरी-बेड में हर चक्र में एक लाख पौधे लगाने की क्षमता होती है। सर्दी के मौसम में, वे पांच बार बीज से पौध तैयार कर सकते हैं। वे खीरा, करेला, घीया (लौकी), तरबूज, कद्दू, आदि की पौध तैयार करते हैं।

राजेंद्र स्वाभाविक रूप से फाइनेंस-परक हैं! वह सब्जी की अनुसार पौध की कीमत तय करते हैं। उदाहरण के लिए, करेले के लिए कीमत 5 रुपये प्रति पौधा है, क्योंकि इसकी सब्जी के बाजार में 40 रुपये प्रति किलोग्राम मिलते हैं। कुछ प्रकार की सब्जियों के लिए, यह 1.25 रुपये है। यदि वे खरीफ़ के मौसम में 5,00,000 पौधे और रबी में 1,00,000 पौधे तैयार करते हैं, तो इसकी बिक्री से उन्हें 6 से 10 लाख रुपये के आसपास प्राप्त हो सकते हैं।

उन्होंने हमें बताया कि लाभ का प्रतिशत 50 है। उनके परिवार और उनके कुटुंब के ही आस-पड़ोस के 10 से अधिक लोगों को उनके व्यवसाय में काम मिल रहा है। काम कठिन है, खासतौर पर प्लास्टिक ट्रे तैयार करने का, जिसमें मिट्टि की बजाय नारियल के बुरादे का प्रयोग किया जाता है, जिसे वे रांची से खरीदते हैं। परिवार की महिलाएं उपयोग से पहले नारियल के बुरादे को साफ़ करने में मदद करती हैं।

लखपति किसान

जब हम बिना बताए नगदी गांव पहुंचे, तो राजेंद्र कुछ ग्राहकों के साथ बातचीत कर रहे थे, जो 3,000 पौधे खरीदने आए थे। हमने उनसे भविष्य की उनकी योजना और इसमें होने वाली प्रतिस्पर्द्धा के बारे में पूछा। उनका उत्तर हमारे लिए एक सीख थी!

पृष्ठभूमि में कृषि-उद्यमी राजेंद्र टुडू की पॉलीहाउस नर्सरी के साथ,‘लखपति किसान’ कार्यक्रम के बारे में बोर्ड

उन्होंने कहा – “हाँ, मेरी सफलता को देखने के बाद, सब्जी के पौधों की नर्सरी के तीन या चार पॉलीहाउस स्थापित हो गए हैं। प्रतियोगिता कोई नहीं है। जब मेरे पास किसी किस्म की सब्जी नहीं होती हैं, तो मैं अपने ग्राहकों को उनके पास भेज देता हूं। वे भी ऐसा ही करते हैं। पौध उगाने में आने वाली कठिनाइयों के बारे में हम आपस में सलाह मशवरा करते हैं।”

राजेंद्र ने CInI से पास में ही एक और पॉलीहाउस बनाने में सहायता का अनुरोध किया है ताकि वे अपनी क्षमता में वृद्धि कर सकें। CInI सहमत नहीं हुई! “उन्होंने कहा कि मुझे किसी अन्य व्यक्ति को दूसरी जगह इस व्यवसाय को शुरू करने देना चाहिए और मुझे उसकी मदद करनी चाहिए।” राजेंद्र ने सहजता से सहमत हो गए!

2020 के भारत और झारखंड को राजेन्द्र टुडू जैसे हजारों लोगों की जरूरत है! वे सही मायने में एक लखपति किसान हैं।

अजीत कानितकर पुणे में विकास अण्वेश फाउंडेशन में शोध टीम के सदस्य हैं। इससे पहले, उन्होंने फोर्ड फाउंडेशन और स्विस एजेंसी फॉर डेवलपमेंट एंड कोऑपरेशन (दोनों नई दिल्ली में) में काम किया। उन्होंने 1992-1995 के दौरान इंस्टीट्यूट ऑफ रूरल मैनेजमेंट, आणँद में पढ़ाया। विचार व्यक्तिगत हैं।

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