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लॉकडाउन के कष्ट

आजीविका के नुक्सान के चलते भूमिहीन परिवारों को लॉकडाउन का भुगतना पड़ रहा है खामियाजा

भूमिहीन आदिवासी समुदायों के उद्यमी ग्रामवासियों ने आजीविका के दूसरे तरीके अपनाए। लॉकडाउन में ढील के बावजूद, मौजूदा चुनौतियां उन्हें गरीबी की ओर धकेल रही हैं

अपनी ई-रिक्शा चलाने और लॉकडाउन में उसका ऋण चुकाने में असमर्थ, एक भूमिहीन आदिवासी समुदाय के ज्वेल हेज़ोवरी, खेत मजदूर के रूप में काम करते हैं (छायाकार - दीप्ति गोयारी)

COVID-19 और उसके बाद के लॉकडाउन से आम आवागमन और आर्थिक गतिविधियों के सुस्त हो जाने के कारण, ग्रामीण भारत भर में लोगों का एक वर्ग गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है – हमारे गांवों के भूमिहीन समुदाय। भारत के कई हिस्सों में, भूमिहीनता या खेती योग्य भूमि के अभाव की जड़ें ऐतिहासिक हैं।

मध्य प्रदेश का अर्द्ध-घुमंतू बैगा समुदाय, जो काफी हद तक जंगलों पर निर्भर करता है, और सिक्किम का चरवाहा भूटिया समुदाय इसके उदाहरण हैं। लेकिन, हाल के दिनों में, जमीन के विभाजन से हुए आबादी-सम्बन्धी बदलावों के कारण, भूमिहीनता उन परिवारों तक भी फैली है, जिनके पास पहले जमीन होती थी।

पूर्वोत्तर भारत में भूमिहीन लोग लगभग 60% हैं, जोकि देश के बाकी हिस्सों की तुलना में अधिक है।

पूर्वोत्तर राज्यों में सबसे अधिक आबादी वाले असम में 3.5 लाख से अधिक परिवार भूमिहीन हैं। असम के उदलगुरी जिले में, ग्रामीण आबादी का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है, जिसमें या तो भूमिहीन हैं या बहुत थोड़ी जमीन वाले परिवार हैं।

बढ़ती आबादी और रोजगार के अवसरों के अभाव में, उदलगुरी के ग्रामीण क्षेत्रों से काम की तलाश में युवा लोग भारत भर के विभिन्न शहरों में पलायन करते हैं। भूमिहीन परिवारों में पलायन अधिक है और उनकी टिकाऊ आमदनी का यही स्रोत है।

जिले के इन भूमिहीन परिवारों के लिए, आमदनी के दूसरे स्रोत हैं – मजदूर के रूप में काम करना, चाय-पत्ति तोड़ना, सड़क निर्माण में काम करना, रिक्शा चलाना, और इसके अलावा बढ़ईगीरी और ऐसे ही छोटे धंधे। जिन लोगों ने आजीविका के छोटे काम वाले विकल्प चुने थे, उनके लिए लॉकडाउन के दौरान गुजारा करना मुश्किल हो गया है।

जिले के भूमिहीन परिवारों के उद्यमी व्यक्तियों ने नए काम शुरू कर लिए हैं, जिससे उनके परिवारों को अत्यधिक गरीबी से उबरने में मदद मिली है। जूलियस बासुमातरी और ज्वेल हेज़ोवरी ऐसे ही दो व्यक्ति हैं। फिर भी, COVID-19 संकट ने इन महत्वाकांक्षी युवाओं के लिए अलग तरह की चुनौती खड़ी कर दी है और यह उन्हें गरीबी की ओर धकेल रहा है।

ग्रामीण उद्यमिता

जूलियस बासुमातरी के लिए, उदलगुरी जिले की रोवा तहसील के पुरानी गोराईबाड़ी गाँव में वायरस का जोखिम दूर की कौड़ी लग रहा था। 36 वर्षीय बासुमातरी, जो कि बोडो आदिवासी समुदाय से हैं, पिछले 10 वर्षों से एक चाय की दुकान चला रहा है। यह उनकी पत्नी और चार बेटों सहित, छह लोगों के परिवार के लिए आमदनी का एकमात्र स्रोत है।

लॉकडाउन प्रतिबंधों का अर्थ भूमिहीन आदिवासी समुदाय के जूलियस बासुमातरी जैसे पुरुषों के लिए आमदनी का नुकसान है, जिन्होंने आजीविका के लिए एक चाय की दुकान चलाने का काम चुना (छायाकार – दीप्ति गोयारी)

लगभग 6,500 रुपये की मासिक आमदनी कभी भी काफी नहीं थी, लेकिन परिवार किसी तरह चला रहा था। चाय की दुकान से यह सुनिश्चित हो रहा था कि उसका परिवार कभी भूखा न रहे और उसके बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सके। तभी अचानक लॉकडाउन हो गया, जिसके लिए बासुमातरी तैयार नहीं था।

बचत तेजी से घटने लगी और इसके साथ ही भोजन की उपलब्धता, जिससे दिन में तीन भोजन की जगह दो हो गए। चर्च और सरकार की सार्वजनिक वितरण प्रणाली सहित दूसरे श्रोतों से राशन की मदद आई, लेकिन यह पर्याप्त नहीं थी। लॉकडाउन हटने के बाद, अपनी पत्नी के परिवार से कर्ज लेकर, उसने फिर से अपनी दुकान खोली है। लेकिन धंधा मंदा है, क्योंकि लोग बाहर जाकर खाने से डरते हैं। और एक बार फिर लॉकडाउन हो जाने का डर भी है।

वैकल्पिक आजीविका

उसी गाँव के ज्वेल हेजोवरी, हर सुबह अपनी कीमती संपत्ति, एक ई-रिक्शा साफ करते हैं। एक छोटे लड़के के तौर पर, उन्हें अपने परिवार की मदद करने के लिए, दैनिक मजदूरी का काम करने के लिए, स्कूल छोड़ना पड़ा था। वर्षों की छोटी-छोटी बचत करके उन्होंने 30,000 रुपये जमा किये, जिसे उन्होंने पिछले साल अपना ई-रिक्शा खरीदने के लिए तुरंत-भुगतान के रूप में प्रयोग किया।

लॉकडाउन के प्रतिबंध का ज्वेल हेज़ेवरी जैसे भूमिहीन पुरुषों के लिए मतलब है आय का नुकसान, जिन्होंने आजीविका के लिए ई-रिक्शा चलाने का काम चुना (छायाकार – दीप्ति गोयारी)

इससे हेजोवरी का एक प्रिय सपना साकार हुआ, जो इस 30 वर्षीय बोडो आदिवासी नौजवान और उसके परिवार के लिए, एक धीमी लेकिन निश्चित सामाजिक और आर्थिक प्रगति थी। एक ई-रिक्शा की कीमत 1.2 लाख रुपये है, जिसकी मासिक किस्त 3,000 रुपये है।

हजोवरी लोगों को बाजार से उनके गाँवों तक लाने ले जाने के लिए रोजाना लगभग 1,000 रुपये कमा रहे थे। अपने जीवन में वे पहली बार, किसी तरह घसीटने की बजाए, वह एक जीवन जी रहे थे। फिर लॉकडाउन हुआ और पैसा आना बंद हो गया, और उसी के साथ रुक गया उसका नया जीवन।

भारतीय रिजर्व बैंक की तीन महीने तक ऋण स्थगन की घोषणा से बड़ी राहत मिली। लेकिन लॉकडाउन शुरू होने के बाद, तीन महीनों में उनकी अपनी बचत ख़त्म हो गई। अब जब लॉकडाउन के नियमों में कुछ ढील हुई, तो उन्होंने नए सिरे से शुरुआत करने की कोशिश की, लेकिन लोग अभी भी सार्वजनिक परिवहन का उपयोग नहीं करना चाहते।

अब जुलाई में ऋण स्थगन की अवधि समाप्त हो रही है, तो वे बेसब्री से दोबारा अपनी ई-रिक्शा चलाना चाहते हैं, लेकिन तुरंत यह एक विकल्प नहीं है। भूमिहीन होने और आजीविका का कोई और स्रोत न होने के कारण, हेजोवरी अनिच्छा से दिहाड़ीदार खेतिहर मजदूर के रूप में काम करने के लिए खेतों में वापस चले गए हैं| ई-रिक्शा रुक गया है, लेकिन चूल्हा चालू रखना है।

संसाधनों का अभाव

बासुमातरी और हेज़ोवरी के लिए, हालात सामान्य होने में लंबा समय लगेगा। उदलगुरी और देश भर के ग्रामीण क्षेत्रों के भूमिहीन परिवार, आजीविका का कोई निश्चित स्रोत नहीं होने के कारण, सबसे नाजुक स्थिति में हैं। उनमें से अधिक महत्वकांक्षी लोगों ने, नई और अलग आजीविका में अपने जीवन भर की कमाई लगा दी थी। महामारी ने उनकी आमदनी के रास्तों को तबाह कर दिया है।

जूलियस बासुमातरी जैसे भूमिहीन पुरुष, जो चाय की दुकान चलाकर जीवन यापन करते थे, आजीविका का वैकल्पिक साधन अपनाकर गरीबी में फसने के जोखिम का सामना कर रहे हैं (छायाकार – दीप्ति गोयारी)

छोटे काम-धंधे फिर से शुरू करने के लिए उनके पास पैसा नहीं है। यदि किसी तरह बासुमातरी और हेज़ोवरी जैसे लोग दोबारा शुरुआत कर भी लें, तो भी COVID​​-19 के इस समय में कम कम आमदनी के कारण उनके व्यवसाय टिक नहीं पाएंगे।

कुछ और महीनों तक, इन दो बोडो पुरुषों को जीवन यापन के लिए, मिलने वाली राहत और गांव तथा आसपास के इलाके में मिलने वाली मजदूरी पर निर्भर रहना होगा। ग्रामीण भारत के लाखों भूमिहीन परिवारों की कहानी भी ऐसी ही होगी।

दीप्ति गोयारी ‘सेवन सिस्टर्स डेवलपमेंट असिस्टेंस (सेस्टा)’ के साथ काम करती हैं, और उदलगुरी जिले में रहती हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।

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