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खाद्य-वन

खाद्य वन से किसानों को मिलता है बेहतर मुनाफा

वनों से सबक लेते हुए, भारत भर में प्रगतिशील किसान अपने खेतों को बहु-मंजिल फसल प्रणाली में बदल रहे हैं, जो जलवायु के लिए ज्यादा अनुकूल है और अधिक पैदावार देता है

विकसित किए जाने के एक चरण में एक खाद्य वन, जिसमें किसान थंगावेलु जमीनी फसलों की बेहतर पैदावार ले पाए हैं (छायाकार - बालासुब्रमण्यम एन.)

हालांकि अमेज़ॉन वर्षा वन दुनिया का सबसे बड़ा बचा हुआ कुदरती वन है, लेकिन हाल के शोधों से पता चलता है कि अछूते जंगल वास्तव में मानव निर्मित भोजन वन थे। हजारों वर्षों तक, मनुष्य भोजन के लिए जंगलों पर निर्भर थे। समय के साथ, गांवों और खेतों ने जंगलों की जगह ले ली।

लेकिन अभूतपूर्व जलवायु परिवर्तन, हमें अपने भोजन के उगाने के तरीके पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य कर रहा है। भारत में अधिक से अधिक किसान ऐसे खाद्य वनों के बारे में सोचने लगे हैं, जिनमें स्वयं जीवित रहने लायक सहनशक्ति हो, जिन्हें कम सिंचाई की जरूरत हो और उनकी उत्पादकता बेहतर हो, और जिनसे देश को वर्तमान कृषि संकट से निपटने में मदद मिले।

कुदरती वनों का अनुकरण

पुदुचेरी के वन और वन्यजीव विभाग के उप निदेशक, कुमारवेलु ने VillageSquare.in को बताया – “जब अधिकाधिक जंगल गायब हो रहे हैं, तो जलवायु परिवर्तन बदतर होता है और हमारी कृषि व्यवस्था कमजोर होती है। इससे निपटने के लिए, और देश के 33% न्यूनतम वन-आवरण के निर्माण में मदद करने के लिए, खाद्य वन ही आगे बढ़ने का रास्ता हैं।”

कुमारवेलु के अनुसार, एक जंगल को जोतने, खरपतवार निकालने, कीटनाशक या किसी मानवीय हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं होती। “कल्पना कीजिए कि ऐसे वन में वह भोजन हो, जिसे हम खा सकें, और यही खाद्य वनों का आधार है।”

खाद्य वनों को प्राकृतिक वनों के अनुसार ही डिज़ाइन किया गया है और आम तौर पर इसकी सात परतें होती हैं – ऊंचे फलदार और अखरोट जैसे मेवे के पेड़ों की एक शामियानानुमा परत, छोटे पेड़ों की छतरीनुमा परत, फलों की झाड़ियों की एक परत, घास की परत, जमीन-स्तर पर परत, जड़ किस्म की मूल फसलों की परत और बेलों की एक सीधी ऊपर जाती परत।

जंगल की रूपरेखा तैयार करना

किसान थंगावेलु (62) के लिए, 2008 में सुभाष पालेकर के शून्य-बजट खेत का दौरा इस दिशा में पहला कदम था। इस यात्रा से उन्हें पीढ़ियों से की जा रही धान की खेती से, बहु-फसलीय खेती की ओर मोड़ दिया। जब कुमारवेलु तमिलनाडु के विल्लुपुरम जिले के पुथुराई गाँव में 30 सेंट (एक तिहाई एकड़) के एक छोटे खाद्य वन के लिए किसी को साझीदार बनाना चाहते थे, तो थंगावेलु ने इस मौके को झपट लिया।

कुमारवेलु जलवायु परिवर्तन के असर और अन्य कृषि सम्बन्धी समस्याओं के समाधान के रूप में खाद्य वनों की वकालत करते हैं (छायाकार – बालासुब्रमण्यम एन.)

थंगवेलू ने VillageSquare.in को बताया – “स्थानीय पेड़ों की एक जीवंत बाड़ बनाने से लेकर, बिना मिट्टी से छेड़छाड़ के पानी की बूंदा-बांदी करने वाला एक  वर्षा-पाइप लगाने तक, हम कदम दर कदम जंगल तैयार करते हैं। हमने केले और हल्दी जैसी बारहमासी प्रजातियां लगाई, जिनमें हाथ का काम करने की कम से कम जरूरत होती है।

कम पानी, अधिक पैदावार

सूखे फार्म और चावल के खेतों से घिरा, थंगवेलू का जंगल एक अलग ही दुनिया है। बड़े शामयानानुमा पेड़ों से यह सुनिश्चित होता कि चिलचिलाती धूप के बावजूद अंदर का वातावरण ठंडा हो। पपीता, केला, हल्दी, मिर्च, दालें, लौकी, काली मिर्च और फूलों जैसी हरे भरे और लगभग जंगली वातावरण में उगती हैं।

थंगवेलू के अनुसार, हल्दी जो आम तौर पर एक पौधे पर 300 ग्राम लगती है, वह खाद्य वन में प्रति पौधा 1 किलोग्राम तक पैदा होती है। उन्होंने 2018 में, पुदुचेरी के थिरुबुवनई में अपनी खुद की जमीन में एक और खाद्य वन सफलतापूर्वक बनाया।

इसमें भी डिजाइन इस बात पर केंद्रित है कि वह अपने बूते पर टिकने वाली व्यवस्था बने। वह सात परतों वाली व्यवस्था तैयार कर रहे हैं, जिससे वह बहुत कम मजदूरी के साथ फसल ले सकें। उन्होंने VillageSquare.in को बताया – “हमने केले और गैंदे जैसे पौधे लगाए, जो एक-दूसरे की मदद करते हैं। वर्षा-पाइप, जो अब केवल सामान्य सिंचाई का दसवां हिस्सा ही उपयोग करता है, उसकी भी जल्द ही ज़रूरत नहीं रहेगी, क्योंकि मौजूदा पेड़ों की पत्तियों से भी ये ढके रहते हैं।”

परत पर परत जोड़ना

स्थानीय वातावरण-तंत्र के आधार पर, हर खाद्य वन का डिज़ाइन थोड़ा अलग होता है। संदीप सक्सेना, जिन्होंने मध्य प्रदेश में कई खाद्य वनों, ‘अरण्यानी’ पर काम किया है, ने इन सात परतों में खुली घूमने वाली मुर्गियों, पशुओं, मधुमक्खियों और मछलियों को शामिल किया है।

यह समझाते हुए कि उन्होंने और उनकी टीम ने कैसे 150 एकड़ बंजर भूमि को खाद्य वन में बदल दिया, सक्सेना कहते हैं – “बंजर भूमि में कुछ जीवन डालने के उद्देश्य से हमने पहला कदम जो उठाया, वह था बेशरम और लैंटाना जैसी कुछ कठोर झाड़ियां लगाई, जो थोड़ी सी मदद से उग जाएंगी। एक बार वे उग गई, तो टीम ने पीपल या नीम जैसे कठोर पेड़ लगाए, जिन्हें टिकने में लगभग एक साल लगा।”

मध्य प्रदेश में एक पूर्ण विकसित अरण्यानी खाद्य वन (फोटो – संदीप सक्सेना के सौजन्य से)

सक्सेना ने VillageSquare.in को बताया – “मिट्टी की संरचना को मजबूत करने के लिए खस और लेमनग्रास जैसे पौधों का उपयोग करते हुए, अगले साल हमने नींबू और करौंदा जैसे छोटे पेड़ लगाए। चौथे साल में, हमारे पास पेड़-पौधों की एक परत के साथ एक जीवंत वातावरण-तंत्र था। हमने हल्दी, शकरकंद, आदि के साथ सबसे निचली परत तैयार की।” उन्होंने पक्षियों और पशुओं के लिए पानी के स्रोत के रूप में तालाब भी बनाए हैं (पेड़ों के लिए नहीं)।

उनके प्रत्येक खाद्य वन के बनने में चार से सात साल लगे और अब उनके पास 175 से अधिक किस्में हैं। सक्सेना के अनुसार, जैविक खेती के विपरीत, एक खाद्य वन में, मिट्टी को नुकसान पहुंचाने वाली जुताई नहीं होती है, और न ही इसमें आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) फसल या एकल-फसल पद्यति का उपयोग करता है। “उदाहरण के लिए, हम दोबारा प्रयोग होने वाले बीजों का उपयोग करते हैं। अनुवांशिक-संशोधित हल्दी की बजाए, अपनी हल्दी के अवशेषों को बिना किसी छेड़छाड़ के मिट्टी में ही छोड़ देते हैं।”

जलवायु सहनशीलता

सक्सेना ने कहा कि मिट्टी की संरचना को मजबूत करने से, मौसम की चरम स्थितियों से निपटने में मदद मिलती है। जब भारी बारिश होती है, तो वन की छिद्रदार मिट्टी आमतौर पर भूमि को पानी से भरने की बजाय, पानी को सोख लेती है।

“ये पेड़ हवा से नमी को सोखने की क्षमता भी रखते हैं, जिस कारण ये सूखे से निपटने में बेहतर सक्षम हैं। नीम और शहतूत जैसे पेड़ यह भी सुनिश्चित करते हैं, कि बेहद गर्म या सर्द मौसम में भी तापमान मध्यम रहे।”

समुदायों को जोड़ना

असम के किसान समीर बोरदोलोई ने अपनी तीन एकड़ जमीन को, न केवल एक सफल वातावरणीय-तंत्र तैयार करने के लिए इस्तेमाल किया है, बल्कि अपनी देसी फसलों को पुनर्जीवित करने के लिए, स्थानीय समुदायों से जुड़ने के लिए भी उपयोग किया है। बोरदोलोई, जिन्होंने 2012 में पारंपरिक खेती शुरू की थी, ने 2016 में खाद्य वनों के साथ प्रयोग करना शुरू किया।

बोरदोलोई ने VillageSquare.in को बताया – ”मैं क्योंकि अपनी अदला-बदली वाली फसल पद्यति से निजात पाना चाहता था, इसलिए मैंने जंगल में फसलों और पौधों को उगाना शुरू कर दिया। जंगल का जबरदस्त विकास देखते हुए, हमने धीरे-धीरे अपने खेतों को भी, देसी फसलों, जैसे यम, असम नींबू, लोकाट, किंग चिल्लीज गार्सिनिया, कमरख (करम्बोला), आदि लगाकर वन का रूप दिया।”

लाभ कमाने के लिए, सक्सेना सुझाव देते हैं कि किसान पैसे कमाने के लिए 2 से 3 मुख्य किस्में लगाएं। बोरदोलोई का मानना ​​है कि मूल्य-वृद्धि के द्वारा अधिक लाभ कमाया जा सकता है। उन्होंने कहा – “उदाहरण के लिए, स्थानीय जड़ी-बूटी ‘रोजेला’ को रु.10 प्रति किग्रा तक नीचे दाम में बेचा जाता है, लेकिन जब हम उसे हर्बल चाय के रूप में बनाते हैं, तो यह रु. 400 प्रति किग्रा पर बिकती है।”

बोरदोलोई कहते हैं – “जंगल अक्सर हमें रास्ता दिखाते हैं। उदाहरण के लिए, हमने देखा कि हरी मिर्च बांस की छाया में अधिक पनपती है। बांसों की एक छतरी (कैनोपी) के नीचे हमें लगभग 80 किलोग्राम मिर्च मिलती है, जो हम 200 रुपये किलो में बेचते हैं।” दोनों किसान कृषि को आमदनी की कमी को पूरा करने का रास्ता लीक से हटकर बताते हैं।

बोरदोलोई ने महिलाओं के साथ, इन पदार्थों के इस्तेमाल से पारंपरिक व्यंजनों को पुनर्जीवित करने के लिए तालमेल किया। समुदाय-आधारित वन-उद्यान बनाने के लिए वे 150 से अधिक स्कूलों में पहुंचे हैं। उन्होंने कहा – “बच्चे मेरे राजदूत हैं और वे इन खाद्य वनों को अलग अलग स्थानों पर ले जा सकते हैं।”

कुमारवेलू इस बात से सहमत हैं कि समुदाय आधारित खाद्य वन, आम लोगों तक गुणकारी उत्पाद पहुँचाने के लिए वास्तव में प्रभावी हो सकते हैं। वे कहते हैं – “तमिलनाडु में, एक योजना थी, जिसके अंतर्गत सरकारी बंजर भूमि में खेती की अनुमति दी जाती थी| ऐसे स्थानों पर खाद्य वनों को बढ़ावा दिया जा सकता है। इसके अलावा बड़े खाद्य वन बारिश ला सकते हैं। एक छोटे किसान के लिए व्यक्तिगत रूप से खाद्य वन स्थापित करने में लगने वाला समय अभी भी एक बाधा हो सकता है।”

कैथरीन गिलोन चेन्नई स्थित एक पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।

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