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महिला बैंकिंग अभिकर्ता

लॉकडाउन सम्बन्धी आर्थिक राहत प्राप्त करने में, ‘बैंक सखियों’ ने की ग्रामीणों की मदद

जिन गाँवों में बैंकिंग सुविधाओं का अभाव है, वहां बैंक के प्रतिनिधियों के रूप में, बैंकिंग अभिकर्ता संबंधित कार्य करते हैं। लाभार्थियों तक लॉकडाउन कल्याण सहायता पहुँचाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है

लॉकडाउन के समय में, ग्रामीण लाभार्थियों तक सरकारी आर्थिक सहायता पहुंचना सुनिश्चित करने के लिए, बैंक-सखियाँ अंतिम कड़ी का काम करती हैं (छायाकार - अमृतेश कुमार, प्रदान)

लॉकडाउन के बीच, रामगढ़ जिले के गोला प्रशासनिक ब्लॉक के हेसोपारा गांव की इंदुरानी मुर्मू के लिए यह एक आम व्यस्त दिन से कुछ अधिक है। जब देश भर के लोग कोरोनोवायरस के संक्रमण के डर से घर में बंद थे, वह बैंकिंग अभिकर्ता के रूप में गोला ब्लॉक कार्यालय के पास बैंक जा रही थी, जो उसके गांव से लगभग 15 किमी दूर है।

जब उसे बैंक जाना होता है, तो वह सुबह 8 बजे शुरू हो जाती है। काम की मात्रा और धूप से बचने के लिए किए गए इंतज़ार के अनुसार वह शाम को घर पहुंचती है, ज्यादा से ज्यादा शाम 7 बजे तक। उसके लिए अपने गाँव और पड़ोसी गांवों के घरों में जाना थोड़ा आसान होता है।

बैंक खातों से संबंधित काम पूरा करने के लिए, वह स्व-सहायता समूहों और ग्राम संगठनों के सदस्यों के घरों का दौरा करती हैं। इंदुरानी मुर्मू और उनके जैसी कई बैंकिंग अभिकर्ता और बैंक सखियाँ, महामारी के दौरान बैंकिंग सम्बन्धी खाई को पाटने का काम करती रही हैं।

लॉकडाउन में समूहों का सहयोग

ग्रामीण विकास मंत्रालय के अंतर्गत, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) ने देश भर में स्व-सहायता समूहों (SHGs) के निर्माण में सहयोग किया है। विभिन्न राज्यों में फैले 63 लाख समूहों ने महिलाओं को उनके और समाज के सशक्तिकरण के लिए एकजुट होने में मदद की है।

स्व-सहायता समूहों की लगभग 6.9 करोड़ महिलाएं, सामूहिक बचत करके, आजीविका गतिविधियों को बढ़ावा कर और जरूरत के अनुसार भावनात्मक और आर्थिक सहायता देकर एक-दूसरे की मदद करती हैं। वे विकास के विभिन्न मुद्दों पर, ग्राम स्तर पर पंचायत के साथ भी काम करती हैं।

प्रशासन की COVID-19 के विरुद्ध लड़ाई में, समूहों की ये महिलाएं सहयोग देने के लिए आगे आई हैं। कोरोनोवायरस के इस संकट में, ग्रामीण भारत को सुरक्षित रखने के लिए, ये स्वेच्छा से यथासंभव मदद करती हैं|

बैंक सखियां

स्व-सहायता समूहों की सदस्यों में से, कुछ महिलाओं को उनके समूहों से जुड़े बैंकिंग-संबंधी मामलों को संभालने के लिए चुना गया है। उन्हें आम तौर पर ‘बैंक सखियां’ कहा जाता है। बैंक सखी की मुख्य जिम्मेदारियों में आम दिनों में, पैसा जमा कराना, निकालना और समूह की महिलाओं में राशि बांटना शामिल है।

अपने लेनदेन में पारदर्शिता रखने के लिए, वे अपने समूह का समय पर ऑडिट भी करती हैं। कभी-कभी बढ़ावा देने वाले सहयोगी संगठन, बैंक सखियों को बैंक-संबंधित कार्यों को संभालने के लिए प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। इससे बैंक के लिए भी आसान हो जाता है, क्योंकि बैंक सखियां अपने काम के बारे में अच्छी तरह से जानती हैं और ग्रामीणों के साथ समन्वय करती हैं।

अपने समूह के खातों को संभालने के अलावा, बैंक सखियाँ, वृद्धावस्था पेंशन योजना, विधवा पेंशन योजना और दिव्यांग पेंशन योजना के लिए पंजीकरण और सरकार द्वारा आवंटित धनराशि की निकासी में भी सहायता करती हैं, जिनके लाभार्थी आमतौर पर ऐसा करने में असमर्थ होते हैं।

सखी का सहयोग

रज्जो देवी (73) हेसोपारा गांव में अपनी बहू और पोते के साथ रहती हैं। परिवार के एकमात्र कमाऊ सदस्य, उनके बेटे ने लॉकडाउन में पैसा भेजना बंद कर दिया, क्योंकि अहमदाबाद में एक निर्माण स्थल पर मजदूर के रूप में उसकी नौकरी चली गई। वह गाँव वापस आने की स्थिति में भी नहीं था।

हालांकि स्व-सहायता समूह की महिलाओं को शुरू में अपने समूह के खातों को संभालने का प्रशिक्षण मिला था, लेकिन उनमें से कुछ को बैंकिंग अभिकर्ता के रूप में काम करने के लिए अतिरिक्त प्रशिक्षण दिया गया (फोटो – NRLM के सौजन्य से)

रज्जो देवी ने VillageSquare.in को बताया – “इंदुरानी के कारण मुझे वृद्धावस्था पेंशन योजना से 1,500 रुपये नकद मिले। मैं लॉकडाउन शुरू होने के बाद से यह पैसा प्राप्त करने की कोशिश कर रही थी| क्योंकि इंदुरानी ने मुझे पैसे दिलवा दिए, इसलिए मेरे बेटे के सहयोग के बिना भी मेरा परिवार काम चलाने में सक्षम है।”

बैंकों की प्रतिनिधि

सरकार ने COVID-19 राहत उपाय के रूप में, महिलाओं के जन धन खातों में 500 रुपये का प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) करने की घोषणा की। यह देश के लाखों ग्रामीण गरीबों के लिए एक वरदान के रूप में आया। इस राशि के जारी होने के कारण स्वाभाविक रूप से बैंक में भीड़ थी।

लॉकडाउन के दौरान, देश भर में इंदुरानी मुर्मू की तरह, 8,800 बैंकिंग अभिकर्ता और 21,600 बैंक सखियाँ काम कर रही हैं और बैंक प्रशासन को DBT भुगतान के समय बैंक शाखाओं में ग्राहकों की भीड़ के प्रबंधन और सामाजिक दूरी सुनिश्चित करने में मदद कर रही हैं।

ये महिलाएं ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार द्वारा घोषित वित्तीय प्रावधानों के बारे में सूचना प्रसार का मुख्य स्रोत बन गई हैं। कुछ स्थानों पर बैंक सखियों को उनके काम के लिए मामूली पारिश्रमिक मिलता है, लेकिन उनमें से ज्यादातर स्वैच्छिक सेवा प्रदान करती हैं।

जिन ग्रामीण इलाकों में नियमित शाखाएं चलाना संभव नहीं होता, वहां बैंक एक बैंक-बूथ सेंटर के माध्यम से सेवाएं प्रदान करते हैं। बैंकिंग अभिकर्ता या बैंक सखियां बूथ का प्रबंधन करती हैं। इस मौके पर सखियाँ जो घर-घर सेवा प्रदान करती हैं, उससे संकटग्रस्त गरीबों को भोजन मिलना सुनिश्चित हो जाता है।

चुनौतियों से निपटना

इंदुरानी मुर्मू ने VillageSquare.in को बताया – “शुरु के दिनों में, जब लॉकडाउन शुरू हुआ, तो मुझे बैंक सखी के रूप में काम करने में संघर्ष करना पड़ रहा था, क्योंकि पैसे के मामले में ग्रामीण मुझ पर भरोसा करने को लेकर आशंकित थे।

कभी-कभी उसे बैंक जाते समय या लाभार्थियों का दौरा करते समय पुलिस ने उसे रोका। बाद में, जब लॉकडाउन के नियमों में ढील दी गई, तो बैंक ने उसे एक पहचान पत्र जारी किया, ताकि उसे अपना काम जारी रखने में किसी प्रकार की परेशानी न हो।

इंदुरानी मुर्मू कहती हैं कि वह स्वच्छता को लेकर हमेशा ध्यान रखती हैं और सार्वजनिक स्थानों पर शारीरिक दूरी बनाए रखती हैं। गांव के लोग उसे इस महामारी के समय में निस्वार्थ और निडर होकर काम करने वाली महिला के रूप में देखते हैं और कोरोना योद्धा के रूप में उसकी प्रशंसा करते हैं।

ज्ञानेश नानोरे, विकास अण्वेष फाउंडेशन में एक शोधकर्ता हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।

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