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चुनौतियों पर जीत हासिल करते हुए, एक युवा किसान ने प्रदान की आशा और प्रेरणा

एक किसान परिवार से आने वाली, एक युवती ने मौसम संबंधी समस्याओं के बावजूद सफल होकर, स्वयं कृषि में योग्यता प्राप्त की है। अब वह अन्य किसानों, विशेषकर महिलाओं को नई तकनीकों को अपनाने और अपनी आय बढ़ाने के लिए प्रेरित करती हैं

अपने धान के खेत में दिख रही युवा किसान, रसिका फाटक ने हाल ही में खेती की तकनीक के माध्यम से मॉनसून की बाढ़ के बावजूद रिकॉर्ड पैदावार करके लाभ कमाया (छायाकार - हिरेन कुमार बोस)

सुधागढ़-पाली तालुक अपने बल्लालेश्वर गणेश मंदिर के लिए जाना जाता है, जो महाराष्ट्र में भगवान गणेश को समर्पित आठ मंदिरों में से एक है। रायगढ़ जिले की यह तालुक, सरसगढ़ पहाड़ी किले और अंबा नदी के बीच स्थित है, जो सह्याद्री पहाड़ियों से निकलती है। मानसून आने पर, अम्बा हमेशा अपने किनारों से ऊपर बहती है, जिससे क्षेत्र के सीमांत किसानों के खेतों में पानी भर जाता है।

सुधागढ़-पाली तालुक के कोलाधारे गांव की एक किसान रसिका फाटक (23) ने बताया – “जुलाई और अगस्त के बीच पांच मौकों पर मेरा धान का खेत जलमग्न हो गया था। पानी छह फीट ऊँचा था, और फिर भी मैं 2019 में रिकॉर्ड फसल प्राप्त कर सकी।”

फाटक का 32-गुंट्ठा (0.8 एकड़) खेत, प्रसिद्ध मंदिर से लगभग 15 किमी दूर है। 2019 में उन्होंने, सगुना चावल तकनीक (SRT) नामक, बिना जुताई, उठी हुई क्यारी, और सीधी बुआई वाली बेहद टिकाऊ धान उगाने की पद्यति से, प्रति हेक्टेयर 35,200 किलोग्राम पैदावार ली, जो तालुक में एक रिकॉर्ड था।

रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग, रायगढ़, पालघर और ठाणे जिलों में ज्यादातर किसान, परंपरागत रूप से मानसून में केवल एक ही फसल उगाते हैं, जो आमतौर पर धान होती है। SRT में, धान को एक उठी हुई क्यारी में उगाया जाता है। इस तकनीक के अंतर्गत, धान की पुराली को हटाए बिना, उसी क्यारी में अगली फसलों को उगाया जा सकता है। SRT तकनीक से, किसान एक वर्ष में तीन फसलें उगा पाते हैं।

रायगढ़ जिले में, जहां पारम्परिक जुताई और रोपाई तकनीक से प्रति हेक्टेयर 4,500 किलोग्राम पैदावार होती है, वहीं  SRT से 7,000 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर होती है। इसके फायदों और छोटे किसानों के लिए इसकी उपयुक्तता को देखते हुए, महाराष्ट्र भर में 3,000 से अधिक किसान, 1000 एकड़ जमीन में SRT द्वारा खेती करते हैं, और इस पद्यति को अपनाने वाले किसानों की संख्या हर साल बढ़ रही है।

रसिका फाटक उन किसानों में से एक हैं, जिन्होंने SRT अपनाई है। सफल होने के बाद, वे अब किसानों की आय में वृद्धि के लिए, SRT और दूसरी तकनीकों और तरीकों की वकालत करती हैं। 

पढ़ें: रायगढ़ के किसान कम पानी से चावल की खेती करते हैं

पूरी तरह किसान

एक किसान परिवार की, फाटक ने कृषि में डिप्लोमा किया और उसके बाद यशवंतराव चव्हाण मुक्त विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की। खेती में सम्भावनाओं और कोंकण क्षेत्र के कई कृषि स्नातकों की सफलता को देखकर उन्होंने इसे चुना।

अपनी पढ़ाई के बाद, फाटक ने छह साल तक खेत में काम किया। उन्होंने VillageSquare.in को बताया – “मैंने फसलों की बुवाई से लेकर कीटों की पहचान करने, ट्रैक्टर चलाने तक, खेती से जुड़े सारे काम किए और इस प्रक्रिया में बहुत कुछ सीखा।” उनकी खेती की पृष्ठभूमि और उनकी शिक्षा ने, पारम्परिक तरीकों और नवीनतम तकनीकों को अच्छी तरह से संतुलित करने में मदद की।

SRT ने अपनी शिमला मिर्च की फसल के साथ नजर आ रही रसिका फाटक, जैसे किसानों साल में तीन फसलें उगाने में मदद की (छायाकार – हिरेन कुमार बोस)

उसने अपने परिवार की जमीन को छुड़वाया, जिसे आर्थिक जरूरतें को पूरा करने के लिए गिरवी रखना पड़ा था। सफेद शर्ट और जींस पहने, हरे भरे लहलहाते अपने धान के खेतों के बीच खड़ी, फाटक कहती हैं – “मैंने 2019 में, पहली बार सफलतापूर्वक अपनी भूमि में फसल उगाई।”

कृषि प्रेरक

एक अभिनव किसान, शेखर भड़सावले, जिन्होंने सगुना चावल तकनीक पेश की, द्वारा संचालित एक गैर-लाभकारी संगठन, सगुना राइस फाउंडेशन में एक कार्यशाला में भाग लेने के बाद, फाटक ने अपने खेत में उसी पद्धति को लागू किया।

अक्टूबर के आसपास धान की कटाई के बाद, फाटक उसी क्यारी में पुराली के बीच सब्जियां लगाती हैं। सब्जी की 90 से 120 दिनों की फसल के बाद, वे दालें उगाती हैं| इस प्रकार वे तीन फसलें उगाती हैं, जो इस क्षेत्र में पहले अनसुनी बात थी।

SRT अनोखी है, क्योंकि बीज को प्रत्यारोपित न करके सीधे बोया जाता है। सीधे बुवाई करने से पौधों की जड़ें मिट्टी में अच्छी तरह से पकड़ बना लेती हैं और इस तरह बाढ़ का सामना कर पाती हैं। फाटक की सफलता ने अन्य किसानों को भी प्रेरित किया है| वर्तमान में तालुक में 100 के करीब किसानों ने SRT को अपनाया है।

हर शाम, अपने घर वापस जाते समय, वे महिलाओं से उनके घरों में मिलती हैं और उन्हें व्यक्तिगत या सहकारी व्यवसाय शुरू करने के लिए कहती हैं | वे उन्हें सब्जियां उगाने, पापड़ बनाने, अचार बनाने या एक-दो मुर्गियां पालने के लिए कहती हैं, ताकि परिवार की पोषण सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

नेटवर्किंग

अपने खेत में काम करते हुए भी, वे मोबाइल मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर समूहों के प्रश्नों का जवाब देती रहती हैं। सरकार के कृषि और संबंधित विभागों और इस कार्यक्षेत्र में काम करने वाले अन्य संगठनों द्वारा आयोजित कार्यशालाओं में भाग लेने से, उन्हें नवीनतम गतिविधियों के बारे में जानकारी प्राप्त करने में मदद मिलती है।

ग्रीन आर्मी, कृषिमाई परिवार, सुधागढ़ भातशेती, कोंकण फार्मर और ऐसे ही दूसरे समूहों की सदस्य के रूप में, फाटक तालुक की 34 पंचायतों के लगभग 100 गांवों और 234 बस्तियों के निवासियों के संपर्क में रहती हैं।

फाटक, जिन्हें पंचायत कृषि समिति द्वारा उनकी उपलब्धि के लिए सम्मानित किया गया, बताती हैं – “मैं किसानों के लिए सरकारी योजनाओं, सब्जियों की नई संकर किस्मों, दालों आदि, मशरूम उगाने, पशुपालन, मुर्गी पालन जैसे मुद्दों से संबंधित जानकारी और सलाह साझा करती हूं।”

उल्टा पलायन

रायगढ़ जिला, पर्यटन शहर लोनावला और पनवेल, नवी मुंबई, ठाणे और मुंबई जैसे शहरी केंद्रों के नजदीक है| इसलिए ज्यादातर ज़मींदार, धान की बुवाई के मौसम में अपने गाँवों में आते हैं और बाद में कोरियर बॉय, रिहायशी सोसाइटी में चौकीदार, रेस्टोरेंट में रसोइये, रिक्शा चलाने, प्लम्बर, दर्जी, आदि के रूप में अपना काम फिर से शुरू करने के लिए शहरों में लौट जाते हैं।

रसिका फाटक महिला किसानों से मिलती हैं, और उन्हें अपनी आय बढ़ाने के लिए, नई तकनीकों और तरीकों को आजमाने के लिए प्रोत्साहित करती हैं (छायाकार – हिरेन कुमार बोस)

रासिका फाटक जैसे किसानों की सफलता की कहानियां देखकर, सुधागढ़-पाली तालुक में उल्टे पलायन की घटनाएं देखी जा रही हैं। महामारी लॉकडाउन के कारण ऐसा अधिक हो रहा है। ग्रामीण फाटक को सम्मान प्रकट करने के लिए ‘माई’ कह कर संबोधित करते हैं।

भास्कर पोरे (43), जिन्होंने लोनावला होटल में 15 साल तक रसोइये के रूप में काम किया, ने VillageSquare.in को बताया – “माई ने हमें दिखाया है कि खेती के अलावा, दूध के लिए मवेशी रखे जा सकते हैं, मशरूम उगा सकते हैं, आदि।” वह बेहतरी के लिए अपने गांव लौट आया है, और अब SRT का उपयोग करके, अपने तीन एकड़ के खेत में धान और सब्जियां उगाता है और अपने तबेले में पांच भैंसों की बदौलत, स्थानीय स्तर पर दूध भी सप्लाई करता है।

भरोसेमंद विशेषज्ञता

अपने आप में एक कृषि-उद्यमी, फाटक की एक लाइसेंसशुदा खाद की दुकान है और वे एक पौधा-नर्सरी चलाती हैं, जिससे स्थानीय किसानों और फार्म हॉउसों को फल और सब्जी के पौधे उपलब्ध कराती हैं, जिनकी इस तालुका में संख्या हजारों में है। राजमार्गों पर मौजूद, व्यावसायिक नर्सरियों के विपरीत, उन्होंने किसानों के लिए अधिक उपयोगी होने के लिए, उसे गांव के भीतर ही बनाया है।

जब वृक्षारोपण, बाग लगाने, पौधों को ढकने की चादर के प्रयोग, छाया-जाल डालने, वर्मी कम्पोस्ट एवं जैविक सामग्री बनाने, आदि जैसे खेती के नए तरीके शुरू करने की बात होती है, तो फार्म हाउसों और मुम्बईकर लोगों के बागों के लिए, फाटक संपर्क व्यक्ति हैं।

मुंबई के एक ट्रांसपोर्टर और कोलम्ब गाँव में दो एकड़ खेत के मालिक, जे.डी. गुप्ता (52), ने VillageSquare.in को बताया – “पौधों की सही किस्म का चयन करने, ड्रिप सिंचाई प्रणाली स्थापित करने और खाद स्वयं बनाने में रसिका बेहद मददगार रही हैं।”

पंचायत समिति के कृषि अधिकारी, अशोक चौधरी ने फाटक की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए कहा – “तालुक में धान उगाने की नई तकनीक शुरू करने के अलावा, रसिका ने किसानों को यह दिखाते हुए आजीविका को समृद्ध बनाया है, कि एक व्यक्ति जमीन में कुछ न कुछ पैदा कर सकता है और साल में तीन फसलें उगा सकता है।”

तालुक में 4,600 हेक्टेयर में होने वाली धान की खेती को देखते हुए, जिसमें से मुश्किल से 150 एकड़ जमीन इस समय SRT के अंतर्गत है, विकास पाटिल, संयुक्त निदेशक, कृषि विभाग, कोंकण डिवीजन, जैसे जिले के कृषि अधिकारी, फाटक के प्रयासों में काफी सम्भावना देखते है।

वह फाटक को एक उद्यमी किसान मानते हैं, जो इस क्षेत्र के अन्य किसानों को नई तकनीकों और आजीविका संवर्धन के नए साधनों को अपनाने के लिए प्रेरित करती है। पाटिल ने VillageSquare.in को बताया – “वह एक बेहतरीन विस्तार कार्यकर्ता है, जो जमीनी स्तर पर काम करती है।”

हिरेन कुमार बोस महाराष्ट्र के ठाणे में स्थित एक पत्रकार हैं। वह सप्ताहांत में किसान के रूप में काम करते हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।

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