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कृषि मूल्य श्रंखला

श्योक घाटी के किसानों को है बाजार तक पहुंच का अभाव

खुबानी और सेब उगाने के बावजूद, उत्तरी लद्दाख की श्योक घाटी के किसान लाभ कमाने में असमर्थ हैं, क्योंकि संपर्क-व्यवस्था के अभाव में उनके लिए अपनी उपज बेचना मुश्किल हो जाता है

श्योक नदी के कारण किसान एक साल में दो फसलें उगाने में सक्षम हैं, लेकिन उन्हें अपनी उपज बेचने के लिए सुविधाओं का अभाव है (छायाकार - गौरी अगते आठले )

उत्तरी लद्दाख में नुब्रा घाटी के प्रसिद्ध शीत-रेगिस्तान हुन्डर से आगे,  श्योक घाटी में श्योक नदी, पानी का एक विश्वसनीय स्रोत है, जिसके नाम पर इस घाटी का नाम रखा गया है। पानी और साल के आठ कम ठन्डे महीनों के मौसम में किसान दो फसलें उगा लेते हैं।

इसके बावजूद, 31 वर्षीय किसान, गुलाम मेहदी के लिए गुजारा करना मुश्किल है। वह पाँच भाइयों में सबसे छोटे हैं, और लेह जिले में, बाल्टिस्तान के तुर्तुक कस्बे के करीब एक गांव गारदी में, उन सबकी कुल मिलाकर सिर्फ 2 एकड़ ज़मीन (स्थानीय माप-15 कनाल) है।

मछली पालन को बढ़ावा देने वाली सरकारी योजना के अंतर्गत खोदा गया उनका एक तालाब है, जिसमें वे माउंटेन-ट्राउट और दूसरी मछलियाँ पालते हैं। क्योंकि वहां मशीनें उपलब्ध नहीं थी, इसलिए सबसे बड़े भाई मुसा मेहदी ने यह तालाब हाथों से खोदा था। कुछ मवेशी और मुर्गियों से परिवार की जरूरतें पूरी होती हैं। वे सड़क किनारे एक भोजनालय और घर पर यात्री-निवास चलाते हैं।

अपनी आमदनी के बारे में गुलाम का कहना है – “क्योंकि हमारा 28 सदस्यों का परिवार है, इसलिए जैसे ही कमाई आती है, उतनी ही तेजी से चली जाती है।” कम से कम इस परिवार के लिए, परिवार के आकार और उत्तराधिकारियों को देखते हुए, संपत्ति एक दूर का सपना बना हुआ है| जैसा गुलाम ने बताया – 15 कनाल भूमि पांच भाइयों में बंटेगी, और हर भाई के कई बच्चे हैं।

उनके खेत के नीचे से बहती नदी की बदौलत, कुट्टू (एक प्रकार का अनाज) के खेत हरे भरे थे। जो फसलें वे उगाते हैं, वह हैं – कुट्टू, जौ और बाजरा, लेकिन यहाँ उगने वाले चिनार और नम्रा (विलो) के पेड़ हैं जिनसे आमदनी होती है। फिर भी घाटी से बाहर संपर्क के अभाव में अपनी उपज बेचने के लिए किसानों को संघर्ष करना पड़ता है।

संपर्क की आवश्यकता 

सबसे बड़े भाई मुसा मेहदी ने VillageSquare.in को बताया – “हमें बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है, सड़कें जिनसे हमारी उपज यहां से ले जाई जा सके। यदि थोइस का हवाई अड्डा खोल दिया जाए, तो हमारे यहां अधिक पर्यटक आएंगे।” थोइस भारतीय वायु सेना का एक बेस है, जो गारदी के करीब है, लेकिन इसका इस्तेमाल केवल सैन्य उड़ानों के लिए किया जाता है।

लेह जिले के सुदूर गाँवों के ग़ुलाम मेहदी जैसे किसान संपर्क के अभाव में, अपनी उपज बेच नहीं पाते (छायाकार – गौरी अगते आठले )

देश के बाकी हिस्सों से कटे हुए, दूर-दराज के क्षेत्र में रहते हुए, यहां के लोग स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए पर्यटन के लाभ को समझते हैं। वे जानते हैं कि लेह और लद्दाख के अन्य हिस्सों की अर्थव्यवस्थाओं के लिए पर्यटन ने क्या किया है।

लेकिन यह क्षेत्र पाकिस्तान के कब्जे वाले काश्मीर के गिलगित-बाल्टिस्तान से सटे, नियंत्रण रेखा के करीब है। हालांकि सैनिक हवाई अड्डे का इस्तेमाल पर्यटन के लिए नहीं किया जा सकता, लेकिन ग्रामीणों को लगता है कि इससे इनके दूरदराज और पहाड़ी क्षेत्र से उनकी उपज की ढुलाई की जा सकती है।

मूल्य संवर्धन

कुछ साल पहले, स्वास्थ्य सम्बन्धी फायदों के बारे में जागरूकता के चलते, इस क्षेत्र के जंगली पौधे झरबेरी (sea buckthorn) का जूस बड़ा हिट हुआ था। लेकिन बाद में इसमें अधिक चीनी मिलाई जाने लगी, जिस कारण यह फैशन से बाहर हो गया। इसका फल खट्टा और थोड़ा कड़वा होता है, जिसे सीधे जंगली पेड़ से तोड़कर खाया जाता है।

सितंबर की शुरुआत में, सेब और खुबानी का मौसम समाप्त हो रहा था, हालाँकि अभी भी पेड़ों पर आखरी कुछ फल पक रहे थे। गुलाम के अनुसार मूल्य-संवर्धन से बेहतर मूल्य प्राप्त होता है। वह कहते है – “हम खुबानी को सुखाते हैं, जिससे हमें बेहतर कीमत मिलती है। खुबानी को उसके अंदर के बीज (बादाम जैसा) के साथ बेचने से और भी बेहतर कीमत प्राप्त होती है।”

मेहदी परिवार लगभग 15 क्विण्टल फल पैदा करता है, लेकिन उपयुक्त कमाई के लिए इसे बाजार में पहुँचाने का सवाल खड़ा हो जाता है।

ग़ुलाम बताते हैं कि आठ महीने तक खेती का मौसम होने के कारण यह क्षेत्र, यूनियन टेरिटरी के दूसरे हिस्सों की तुलना में बेहतर है। उन्होंने VillageSquare.in को बताया – “फरवरी तक सर्दी समाप्त हो जाती है, इसलिए हम मार्च तक बुआई शुरू कर देते हैं। तब से लेकर अक्टूबर तक हमारे यहां नर्म मौसम रहता है, जिससे  हम दो फसल उगा लेते हैं, जो  लद्दाख के दूसरे  हिस्सों से अलग है।

बिक्री में सहायता की जरूरत

सितंबर की शुरुआत में, काराकोरम पहाड़ों की छाया में, संकरी घाटी में स्थित गारदी गांव में, मेहदी के खेत में सेब और खुबानी के पेड़ों पर आखरी फल लगे थे। भाइयों ने कहा कि सरकार के द्वारा सहयोग, खासतौर से बिक्री में सहायता, से उन्हें बहुत मदद मिलेगी।

मत्स्य पालन को बढ़ावा देने वाली सरकारी योजना के अंतर्गत खोदे गए तालाबों का कोई खास व्यवसायिक मूल्य नहीं हैं, लेकिन इससे परिवारों की जरूरतें पूरी होती हैं (छायाकार – गौरी अगते आठले)

मूसा कहते हैं – “हम सेब, खुबानी और थोड़े अंगूर उगाते हैं। यदि हम सेब, जो अब उपलब्ध हैं, को स्टोर कर लें और उन्हें जनवरी और फरवरी में बेचें, तो हमें बेहतर कीमत मिलेगी। हम उन्हें स्टोर करते हैं, लेकिन यहां से बाजारों तक ढुलाई बहुत महँगी है।”

बाजार तक पहुंच, सभी उत्पादकों के लिए आने वाली समस्या की तरह, समस्या की जड़ है। और श्योक घाटी के किसान अन्य, बेहतर-जुड़े, देश के कुछ हिस्सों से अलग नहीं हैं, जो यह भी बताते हैं कि वे फसल उगा सकते हैं, लेकिन मार्केटिंग में उन्हें महारत नहीं है।

चाहे वह सब्जी हो, फल हो या बाजरे, झरबेरी और जौ जैसे अनाज हों, हर कोई जैविक खेती करता है। गुलाम ने बताया – “हमारी सारी उपज जैविक है और यह अच्छा होगा कि कोई एजेंसी हमारे माल को बाजार तक पहुँचाए। हमारे लिए इसे अपने क्षेत्र से बाहर ले जाना बहुत महंगा पड़ता है।”

जैसे ही ताजा खुबानी का मौसम समाप्त होता है और सितंबर के अंत तक मूल्य-संवर्धित सूखी खुबानी बाजार में आना शुरू हो जाती है, किसान सबसे अधिक खुश होते हैं, कि उनकी उपज उन बाजारों तक पहुंच गई है, जहां उनकी कीमत बेहतर होगी।

गौरी अगते आठले पुणे की एक पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं। 

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