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घटते पशुचारण

पशुओं को चराने के लिए चरागाहों के घटने के साथ, महिला चरवाहों का प्रभुत्व कम हुआ है

खेती के तौर-तरीकों में बदलाव और जलवायु संकट के प्रभाव से कम होते पशुचारण के कारण, पारम्परिक खानाबदोश चरवाहे बसने लगे हैं। जैसे-जैसे वे दूसरे रोजगारों के लिए पलायन करते हैं, महिलाओं पर अतिरिक्त जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ जाता है

खानाबदोश चरागाहों में कमी, चरवाहा समुदायों की महिलाओं को प्रभावित कर रही है (छायाकार - गगनजीत सिंह)

COVID-19 महामारी के कारण हुए लॉकडाउन के दौरान, देश ने घर लौटते मजदूरों की लम्बी यात्राओं को देखा। लेकिन एक और कमजोर वर्ग था, जिसपर कैमरों ने ध्यान केंद्रित नहीं किया। खानाबदोश चरवाहे बिना चारे या पानी के, कई जगह फंस गए थे, जिनमें से बहुत से लोगों पर कोरोनवायरस को फैलाने का गलत दोषारोपण हुआ।

लम्बे समय से चरवाहों के खिलाफ आधुनिक पूर्वाग्रह बढ़ रहे हैं। जंगलों में लकड़ी की रक्षा करके और चारागाह क्षेत्रों में कृषि को बढ़ाकर सरकारी आय में वृद्धि के उद्देश्य से, अंग्रेजों ने उन्हें चोर और डाकू कहा और जानवरों के चरने पर प्रतिबंध लगा दिया।

उन्हें जंगलों से बेदखल रखने के लिए, स्वतंत्रता के बाद की प्रतिबंध आधारित संरक्षण नीतियां जारी रही, जबकि अतिक्रमण और औद्योगिक अधिग्रहण के कारण, खुले चरागाह-मैदान सिकुड़ गए हैं। जबकि जलवायु संकट, प्रवास के समय को बाधित कर रहा है, खेत की तैयारी के लिए चरवाहों का इंतजार करने वाले किसानों को अब उनकी जरूरत नहीं है।

इन सब कारणों से बहुत से खानाबदोश परिवार, अस्थायी प्रवास या कृषि-पशुचारण, जो खेती और पशु रखने का मिश्रण है, अपनाने के लिए मजबूर हो गए हैं। इससे इनके, विशेषकर महिला चरवाहों के जीवन में नाटकीय बदलाव आए हैं।

उनकी स्वायत्तता और आर्थिक स्वतंत्रता ख़त्म हो खो दी है जबकि काम की जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं। दूसरी ओर, सीमित समय के लिए ही सही, लेकिन लड़कियां औपचारिक शिक्षा प्राप्त कर रही हैं। घर और बाहर  के इन बड़े बदलावों के कारण, महिलाएँ अपने अधिकारों और सीमाओं को लेकर फिर से विचार कर रही हैं।

पशुचारण का ह्रास

देश में लगभग 3.5 करोड़ चरवाहे हैं, जो खाली खेत, घास के मैदानों और जंगलों में पशु चराते हैं। अपने पशुओं के रेवड़ के साथ सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलते हुए, उन्हें मौसम की स्थिति और बदलती जलवायु परिस्थितियों के बारे में अच्छी जानकारी होती है।

पहले किसान रेवड़ों (झुंडों) के आने का इंतजार करते थे, क्योंकि पशु फसल कटाई के बचे हुए अवशेष खाते थे और खेत में गोबर के रूप में खाद छोड़ जाते थे। एक तरह की फसल को वरीयता, पूरे साल भर खेती, और गोबर-खाद की बजाय रासायनिक खाद के उपयोग ने, किसानों और चरवाहों के बीच इस पूरक सम्बन्ध को तोड़ दिया है। अब फसल के अवशेषों को खेत में जला दिया जाता है, जबकि चरवाहों को जानवरों के लिए चारा मिलना मुश्किल होता है।

वन्यजीव अभयारण्यों के विकसित होने से वनों तक पहुंच सीमित हो गई है, जबकि चारागाह भूमि को सौर पार्क, औद्योगिक जोन और वृक्षारोपण-क्षेत्र में बदल दिए जाने से चरवाहों की उत्पादकता कम हो गई है। भले ही बहुतों ने पशुपालन का काम अपना लिया हो, लेकिन उन्हें स्थानीय ग्रामीण चरागाहों को उपयोग करने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

महिलाओं की बढ़ी जिम्मेदारियाँ

एक स्थान पर बसने से जीवन में पेशे में भी विविधता आती है। युवा पुरुष वैकल्पिक नौकरियों के लिए या उच्च शिक्षा के लिए, महिलाओं और लड़कियों पर चराई, लकड़ी काटने, चारे एवं पानी के नए श्रोत ढूंढने सहित, अतिरिक्त जिम्मेदारियाँ छोड़कर, शहरों की ओर पलायन करते हैं।

राजस्थान के एक चरवाहा समूह, रायका समुदाय की महिलाओं पर बनी एक फिल्म में, एक महिला कहती है – “क्योंकि जीवन यापन के लिए हमारे पुरुष अन्य काम करते हैं, जानवरों का ज्यादा काम अब हम पर आ गया है। भोर से शुरू होकर, हमारे अंतहीन कार्यों में बर्तन साफ करना, जानवरों को नहलाना, उन्हें चारा डालना, दूध निकालना, छाछ बनाना और फिर घर के काम करना शामिल हैं।”

महिला आगे कहती है कि पशुओं को चराने के लिए ले जाने से पहले, उन्हें ये सब काम पूरे करने होते हैं। ‘राइका वीमेन स्पीक’ शीर्षक की इस फिल्म में वह कहती है – “मेरी बेटी ने मेरी मदद करने के लिए स्कूल छोड़ दिया। उसके हाथ बंटाने से बहुत मदद मिलती है।”

लिंग-आधारित नए विभाजन

अरुणाचल प्रदेश की याक चराने वाली ब्रोकपा जनजाति की महिलाओं के अनुभव भी ऐसे ही हैं। जलवायु संकट के कारण बढ़ते तापमान ने, गर्मी के प्रति संवेदनशील, शुद्ध नस्ल के याक-पालन को प्रभावित किया है।

सर्दी का मौसम छोटा होने और मौसम में चरम बदलाव के कारण, चारागाहों में चारे और पानी की उपलब्धता कम हो गई है। जहाँ कुछ चरवाहों ने अपने झुंडों को अधिक ऊंचाई वाले स्थानों पर अधिक समय तक रखकर इसके साथ ढल गए हैं, वहीं बहुत से परिवार बस गए और संकर नस्ल के याक पालने लगे, जो कम ऊंचाई पर उच्च तापमान झेल सकते हैं।

याक चराने से जुड़े खानाबदोश जीवन में श्रम का कोई लिंग-आधारित विभाजन नहीं था, और महिलाओं की संसाधनों तक पुरुषों के समान पहुंच थी। लेकिन मुद्रीकृत-अर्थव्यवस्था में हाल के एकीकरण ने, महिलाओं को घरेलू कामों तक सीमित कर दिया है। वे अनदेखे, अवैतनिक काम के जाल में फंस जाती हैं।

जब इन महिलाओं ने दैनिक मजदूरी पर जाना शुरू किया, तो उन्हें यह जानकर निराशा हुई कि महिलाओं को समान काम के लिए पुरुषों से कम मजदूरी मिलती है। उनके पारम्परिक पेशे में ऐसा कभी नहीं था।

अलग-अलग प्रभाव

एक खानाबदोश (घुमन्तु) जीवन से एक जगह बस कर जीने के बदलाव ने, महिलाओं को एक तरह से गृहस्थी में टिकाऊपन प्रदान किया है, लेकिन आर्थिक खर्चों और अपने भविष्य के बारे में निर्णय लेने की स्वायत्तता को लेकर अस्थिरता भी पैदा की है।

दूध और जानवरों के गोबर को खाद के रूप में बेच लेने से, चरवाहा महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता मिलती थी। जब वे एक स्थिर जीवन अपनाती हैं, तो उनके जानवरों का दूध डेयरी सहकारी समितियों में जाता है, और पैसा पुरुषों के हाथ में चला जाता है।

गुजरात के मालधारी चरवाहा समुदाय की महिलाओं को लगता है कि आजीविका के विविधीकरण ने आर्थिक संसाधनों तक उनकी पहुंच कम कर दी है।

गुजरात के एक चरवाहा एडवोकेसी समूह, मालधारी ग्रामीण एक्शन ग्रुप (MARAG), की नीता पंड्या कहती हैं – “उनकी पारम्परिक वेशभूषा में डेरी उत्पादों की बिक्री की कमाई रखने के लिए एक जेब रहती थी। अब वे पुरुषों पर अधिक निर्भर महसूस करते हैं और ये उनके आत्मसम्मान की हानि है।”

पैसे के आकर्षण ने महिलाओं के द्वारा डेरी उत्पादों का उपभोग कम कर दिया है। दूध सहकारी समिति को बेच दिया जाता है और जो कुछ बचता है, उसे परिवार के दूसरे सदस्य पहले पीते हैं।

चरवाहा महिलाओं की कई प्रथाएँ खो रही हैं, जो उनकी यात्रा के दौरान अगली पीढ़ियों को दी जा रही थीं। परिवार के लिए अस्थाई आशियाने बनाने और जानवरों के लिए बाड़े बनाने, अलग-अलग इलाकों की औषधीय जड़ी-बूटियों की पहचान करने, और माल की अदला-बदली (बार्टर) सम्बन्धी कौशल में गिरावट आई है।

बदलती जीवन शैली

बदलती जीवन शैली और प्रवास के तरीकों के साथ, मजबूत स्थानीय नेटवर्क और सामाजिक मंडलियां, जो कभी उनके अस्तित्व और आवागमन में सहायक थीं, वे अब गड़बड़ा गईं हैं।

MARAG की अनु वर्मा कहती हैं – “इन महिलाओं का जीवन-चक्र सह-अस्तित्व के इर्द-गिर्द घूमता था, लेकिन अब उनका पूरा माहौल ही बदल रहा है, जिससे शक्ति का संतुलन पुरुषों की ओर जा रहा है। मजबूत, मुखर और शक्तिशाली महिलाएं अब घरेलू मजदूरी करने लगी हैं। वे अपनी शान में कमी महसूस कर रही हैं। फिर भी, उन्हें अपने पारम्परिक जीवन को पुनर्जीवित करने के लिए एक अवसर की तलाश है।”

राइका महिलाओं के हालात में बदलाव हो रहा है, क्योंकि उनमें से कुछ शिक्षा प्राप्त कर रही हैं और अपने विचार व्यक्त करने के लिए और व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्वतंत्रता को प्रतिबिंबित करने रास्ते ढूंढ पा रही हैं। राइका महिलाओं के विचारों को संकलित करती इस रिपोर्ट के अनुसार, नकारात्मक या सकारात्मक रूप में इन बदलावों के मूल्य का पता लगा पाना बहुत मुश्किल है।

ये महिलाएं प्रतिरोध भी प्रदर्शित कर रही हैं। वे मौजूदा व्यवस्थाओं के प्रति असंतोष व्यक्त करने के तरीके ढूंढ रही हैं| उदाहरण के लिए, जिन समितियों में राइका लोगों को शामिल नहीं किया जाता, उन समितियों द्वारा पशु चराने पर रोक लगी ग्राम गौचर (चरागाहों) में, अपने रेवड़ चुपके से चराती हैं।

सीमित शिक्षा

युवा राइका लड़कियां समझती हैं कि जिन संस्थाओं से उनका रोज-रोज पाला पड़ता है, उन विभिन्न दमनकारी संस्थानों से पार पाने के लिए, और दिहाड़ी मजदूरी के हटकर एक बेहतर आजीविका सुरक्षित करने के साधन के रूप में, शिक्षा एक महत्वपूर्ण हथियार है।

हालांकि, पुरुषों के द्वारा बनाए सामुदायिक नियमों के माध्यम से, हाई स्कूल पास करने वाली महिलाओं को आमतौर पर बाहरी दुनिया के व्यवहार करने से रोका जाता है, जिसमें उच्च शिक्षा के लिए नजदीकी शहर में जाना शामिल है।

कई लड़कियों को परिवार की मौजूदा महिला-आधारित भूमिका को निभाना पड़ता है, जिसमें जानवरों की देखभाल करना और वे सब काम करना, जो पशु चराने के काम का हिस्सा हैं। बेहतर काम की तलाश में घर छोड़ने वाले युवकों की अनुपस्थिति में, छोटी राइका लड़कियों का जीवन पशुचारण से बंध जाता है।

षण्मुगा प्रिया टी. गुजरात के सूरत शहर में स्थित एक स्वतंत्र शोधकर्ता है। विचार व्यक्तिगत हैं।

(यह लेख पहली बार GOI Monitor में प्रकाशित हुआ था।)

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