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सामुदायिक रेडियो

सामुदायिक रेडियो से ग्रामीणों को तथ्यात्मक, समय पर जानकारी मिलने में मदद मिलती है

चाहे खेती कार्य हो या पोषण और कोरोनावायरस संक्रमण के बारे में जागरूकता हो, 90.8 ग्रीन एफएम श्रोताओं को सटीक जानकारी उनके पसंदीदा रूप में प्रदान करता रहा है

सामुदायिक रेडियो 90.8 एफएम ग्रीन, श्रोताओं को सरकारी योजनाओं के बारे में नवीनतम समाचार और जानकारी प्राप्त करने में मदद कर रहा है (छायाकार - ईश्वर चंद्र)

शाम के 6.30 बजे, बिहार के भागलपुर जिले के बरहारी गाँव की सात महिलाएँ प्रतिमा देवी के बरामदे में एकत्रित हुईं, जिन्होंने एक मेज पर अपना रेडियो रख दिया था। पांच बच्चों के आंख और कान भी रेडियो पर लगे हुए थे, हालांकि वे आंगन में खेल रहे थे। अचानक रेडियो से एक मधुर आवाज़ निकली और हर कोई चुप हो गया।

रेडियो जॉकी (आरजे), अन्नू ने घोषणा की – “आप सुन रहे हैं 90.8 ग्रीन एफएम, हरियाली से खुशियां तक…।” जिले में कोरोनोवायरस संक्रमण की स्थिति सहित, कुछ महत्वपूर्ण समाचार साझा करने के बाद, आरजे ने एक स्थानीय लड़की समीरा को भागलपुर की सुनिधि चौहान, जो एक प्रसिद्ध पार्श्व गायिका हैं, के रूप में पेश किया।

जैसे ही महिलाओं और बच्चों ने पहली कुछ पंक्तियाँ सुनीं, उन्होंने तालियाँ बजाना शुरू कर दिया, क्योंकि समीरा ने जो लोकगीत गाया, वह उनकी स्थानीय बोली में था। गीत समाप्त होने के बाद बच्चे तितर-बितर हो गए, जबकि महिलाएं अगले पांच दिनों के मौसम का पूर्वानुमान सुनने के लिए रुकी रहीं।

स्थानीय आबादी के पसंदीदा प्रारूप और बोली में कार्यक्रम पेश करके, 90.8 ग्रीन एफएम सामुदायिक रेडियो, फर्जी खबरों का पर्दाफाश करने के साथ-साथ, खेती के तरीकों, पोषण आदि के बारे में श्रोताओं को बड़े स्तर पर प्रभावित कर रहा है।

सामुदायिक रेडियो

बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) ने 2019 में भागलपुर जिले की 121 पंचायतों के 851 गाँवों के पाँच लाख ग्रामीणों तक सीधे पहुँचने के लिए समयानुसार मौसम की जानकारी के अलावा स्थान-विशेष के कृषि और खेती के तरीकों सम्बन्धी समाचार लेकर, सामुदायिक रेडियो सेवा, 90.8 एफएम ग्रीन की शुरुआत की।

बहुत कम समय में, यह स्थानीय संस्कृति को बढ़ावा देने और सरकारी योजनाओं के प्रसार का एक मंच बन गया। बीएयू में मीडिया सेंटर के प्रभारी, ईश्वर चंद्र ने बताया – “90.8 एफएम ग्रीन उन सभी क्षेत्रों तक पहुँच गया है, जिनकी हमने योजना बनाई थी।”

ईश्वर चंद्र ने बताया – “अब हमारे पास कृषि-आधारित कार्यक्रमों के अलावा, गीत, लोकप्रिय कहानियां, सरकारी योजनाओं की घोषणा एवं स्पष्टीकरण और आम लोगों के लिए स्वास्थ्य परामर्श हैं। कोरोनोवायरस महामारी के दौरान भी, हमने लोगों को सभी आवश्यक जानकारी प्रदान करके उनकी मदद की।”

कृषि पर कार्यक्रम

कृषि विश्वविद्यालय के शस्त्रागार में, सामुदायिक रेडियो स्टेशन एक नया, लेकिन प्रभावी प्रसार उपकरण है। विश्वविद्यालय के उप-कुलपति, आर के सोहाणे का कहना था – “हमें यह अधिक प्रभावशाली लगता है, क्योंकि अब उम्र, लिंग और आर्थिक हैसियत से हटकर, अधिक से अधिक लोग हमारे स्टेशन को सुन रहे हैं।”

कार्यक्रमों की उपयोगिता और सूचना की विश्वसनीयता को देखते हुए, सामुदायिक रेडियो ग्रामीणों में एक बड़ा आकर्षण रहा है (छायाकार – ईश्वर चंद्र)

सोहाणे ने बताया – “हमारी टीम मनोरंजन के साथ शिक्षाप्रद संदेशों को मिलाने और उन्हें एक ऐसे रूप में प्रस्तुत करने में सफल रही है, जिसे हर कोई पसंद करता है। कृषि परामर्श के साथ स्थानीय भाषा में गीत, किसानों में बहुत लोकप्रिय हैं।”

यह रेडियो स्टेशन कृषि, कृषि-उद्यम, और खेती सम्बन्धी दूसरी गतिविधियों से सम्बंधित की अच्छी पद्यतियों पर विभिन्न कार्यक्रम प्रसारित करता है। ये कार्यक्रम समुदाय की आवश्यकता और मांगों के अनुसार विकसित और रिकॉर्ड किए जाते हैं।

विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक न केवल इस तरह के कार्यक्रमों के लिए रिकॉर्ड करके अपनी विशेषज्ञता साझा करते हैं, बल्कि लाइव कार्यक्रमों में भी दर्शकों के सवालों का जवाब देते हैं। दर्शक टेलीफोन कॉल, मोबाइल ऐप या रेडियो के सोशल मीडिया पेज पर टिप्पणियों के माध्यम से प्रश्न पूछ सकते हैं।

काशिमपुर गाँव के 24-वर्षीय किसान, राकेश कुमार को ये गीत बहुत उपयोगी लगते हैं। वे कहते हैं – “जानकारियाँ याद रखना आसान हो जाता है, क्योंकि वे गीतों के रूप में होती हैं। एक बार कोई धुन या लय पसंद आ जाती है, तो हम उसके बोल गाते और गुनगुनाते रहते हैं।”

पोषण-सम्बन्धी जागरूकता

90.8 एफएम ग्रीन ने यूनिसेफ के साथ मिलकर, अपने क्षेत्र में एक पहले से तैयार संचार अभियान प्रसारित किया। मुख्य रूप से महिलाओं और बच्चों की पोषण-सुरक्षा पर केंद्रित यह कार्यक्रम बहुत प्रभावी था।

रेडियो स्टेशन ने उनके नियमित भोजन में हरी सब्जियों और दालों को शामिल करने की जरूरत को दर्शाते हुए सन्देश प्रसारित किया। संदेश 30 दिनों तक लगातार दिन में पांच बार प्रसारित किया गया और यह बहुत प्रभावी रहा।

लाइव कार्यक्रमों से श्रोताओं को उनकी महत्वपूर्ण चिंताओं पर स्पष्टीकरण में मदद मिलती है (छायाकार – ईश्वर चंद्र)

संदेश के प्रभाव पर टिप्पणी करते हुए, एक ग्रामीण, सज्जु देवी ने कहा – “अब माताएं अपने बच्चों को सब्जियां और दाल परोसती हैं और खाने के लिए बहला-फुसला रही हैं। स्थानीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता ने भी गर्भवती महिलाओं को अधिक मात्रा में स्वास्थ्यवर्द्धक हरी सब्जियां खाने का अनुरोध करना शुरू कर दिया है। इस तरह के संदेश हमारे लिए वास्तव में ही उपयोगी हैं।”

तथ्य और विश्वसनीय समाचार

यह सामुदायिक रेडियो स्टेशन COVID-19 महामारी के दौरान, सटीक जानकारी का प्रसार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। सरकार के दिशा-निर्देशों के आधार पर और यूनिसेफ की सहायता से, मास्क की सिलाई, मास्क पहनने के लाभ, सामाजिक दूरी रखने, हाथों को स्वच्छ रखने आदि के तरीकों पर उपयुक्त सामग्री तैयार की गई।

एफएम स्टेशन ने लोगों को जानकारी देने और शिक्षित करने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, क्योंकि सोशल मीडिया के माध्यम से बहुत सी फ़र्ज़ी खबरें और सूचनाएं फैलाई जा रही थीं। करहारिया गाँव के प्राथमिक विद्यालय की अध्यापिका, सोनी देवी ने बताया – “90.8 एफएम ग्रीन जानकारी का एक विश्वसनीय स्रोत है| जब भी हम कुछ डरावना या भ्रामक सुनते थे, हम रेडियो पर भरोसा करते थे और हमारी ज्यादातर शंकाएं दूर हो जाती थी।”

आरजे अन्नू कहती हैं – “हम न केवल फ़र्ज़ी समाचार के बारे में अपने दर्शकों को चेता देते हैं, बल्कि उन्हें तथ्यों से भी अवगत कराते हैं। हमारी 90.8 एफएम ग्रीन टीम व्यक्तिगत रूप से अलग-अलग गाँवों का दौरा करती है और तथ्य-शाला नामक एक कार्यक्रम आयोजित करती है, जिसमें हमने ग्रामवासियों को फ़र्ज़ी और विश्वसनीय समाचारों के बीच अंतर करने के लिए प्रशिक्षित किया।”

स्थानीय बोली में कार्यक्रम

भागलपुर में बोली जाने वाली भाषा, अंगिका सबसे पुरानी भाषाओं में से एक है और यह ज्यादातर अंग क्षेत्र में बोली जाती है, जिसमें बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्से शामिल हैं। अंगिका भाषा में प्रसारित अंग-उमंग नामक कार्यक्रम बहुत लोकप्रिय है।

नाथनगर गाँव के एक लोक गायक, ताराकांत ठाकुर, जिनके गीत अंग-उमंग कार्यक्रम में प्रसारित हुए थे, बहुत खुश और गौरवान्वित थे। ठाकुर कहते हैं – “यह रेडियो स्टेशन स्थानीय प्रतिभाओं को प्रदर्शित करने के लिए एक अच्छा मंच है। सच कहूं तो मैं रेडियो पर अपने गाने सुनकर रोमांचित हूं।”

अंगिका लोक गीतों के रूप में वैज्ञानिक जानकारी पेश करने का स्टेशन का प्रयोग बहुत सफल रहा और कार्यक्रम श्रोताओं के साथ बहुत तेजी से भावनात्मक जुड़ाव स्थापित कर सका। स्थानीय रूप से ज्ञात और सम्मानित विशेषज्ञों की मदद से, स्टेशन ने तनाव-प्रबंधन और लॉकडाउन में बच्चों को सँभालने जैसे मुद्दों पर बातचीत आयोजित की।

समुदाय को फ़र्ज़ी समाचारों से तथ्यों को अलग करना सीखने के लिए प्रशिक्षण देने के लिए, रेडियो स्टेशन की टीम गाँवों का दौरा करती है (छायाकार – ईश्वर चंद्र)

ग्रामीण और शहरी, दोनों दर्शकों ने क्षेत्र-विशेष कार्यक्रमों को पसंद किया और कई कार्यक्रमों के पुनःप्रसारित करने और यहां तक ​​कि प्रसारण का समय बढ़ाने के लिए अनुरोध किया। 90.8 एफएम ग्रीन की बढ़ती लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए, प्रसारण समय को प्रतिदिन तीन से बढ़ाकर 12 घंटे कर दिया गया।

व्यापक पहुंच

90.8 एफएम ग्रीन की फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सएप में अकाउंट के साथ डिजिटल उपस्थिति है। टीम अपने सोशल मीडिया एकाउंट्स का उपयोग विश्वविद्यालय के समाचार, आने वाले कार्यक्रम और घोषणाएँ पोस्ट करने और श्रोताओं के फीडबैक प्राप्त करने के लिए करती है। इनकी मदद से, उन्होंने स्थानीय कलाकारों को अपने गाने, कहानियाँ और अनुभव भेजने के लिए प्रोत्साहित किया, जो बाद में गुणवत्ता के आधार पर प्रसारित किए गए।

ईश्वर चंद्र ने कहा – “हालांकि हमारी टीम बहुत छोटी है और हमारी कई सीमाएं हैं, फिर भी हमने पिछले साल के दौरान असाधारण प्रदर्शन किया है। COVID-19 महामारी के दौरान हमारा योगदान मेरे और हमारे विश्वविद्यालय के लिए बहुत संतोषजनक है।”

20 किमी के दायरे का सीमित प्रसारण क्षेत्र विश्वविद्यालय के लिए चिंता का विषय रही है। इसकी लोकप्रियता से उत्साहित होकर, सोहाणे एफएम ग्रीन कार्यक्रमों को पूरे राज्य में उपलब्ध कराने की योजना बना रहे हैं। सोहाणे कहते हैं – “अपने कार्यक्रमों के व्यापक प्रसार के लिए हम एक मोबाइल ऐप तैयार कर रहे हैं। इसके तैयार हो जाने के बाद, लोग आसानी से सभी कार्यक्रमों को सुन सकेंगे और लाइव कार्यक्रमों को भी सुन सकेंगे।”

रेडियो वापस आ गया है और फिर से लोकप्रिय है। एफएम रेडियो के माध्यम से 90.8 एफएम ग्रीन जैसा स्थानीयकृत प्रसारण, बहुत तेजी से आगे बढ़ा है। विभिन्न पहलुओं पर जानकारी प्रदान करने में इसका सफल उपयोग सराहनीय है और इसे दोहराया जाना चाहिए।

राम दत्त बिहार में पूसा स्थित डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ एग्रीबिजनेस एंड रूरल मैनेजमेंट में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। नीरज कुमार स्कूल ऑफ रूरल मैनेजमेंट, जेवियर यूनिवर्सिटी, भुवनेश्वर, ओडिशा में प्रोफेसर हैं। विचार व्यक्तिगत हैं। ईमेल ramdatt.extn@gmail.com and prof.nkumar@gmail.com

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