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नारी शक्ति

आदिवासी महिलाओं ने सामूहिक खेती से उठाया लाभ

कृषि के आधुनिक तरीके अपना कर और उत्पादक समूहों के रूप में एकजुट होने से, महिला किसानों को अपनी उपज के लिए मोल तोल करने और ज्यादा कमाई में मदद मिली है

कृषि के आधुनिक तरीकों के इस्तेमाल के साथ सामूहिक खेती से, संथाल महिलाओं को अपने खेत की आय बढ़ाने में मदद मिली है (फोटो - PRADAN के सौजन्य से)

अपने बगीचे में खेल रहे बच्चों की ओर इशारा करके, अंजलि हेम्ब्रम कहती हैं – “उन्हें देखो; जब भी मैं पानी के स्प्रिंकलर चालू करती हूँ, ये बच्चे पता नहीं कहाँ से आ जाते हैं।” वह डाँटते हुए उनके पीछे लपकी और उन्हें बगीचे से बाहर भगा दिया।

उनके पति अजीत हेम्ब्रम ने कहा – “चीजें कैसे बदल जाती हैं, लगभग 10 साल पहले, हम इस जमीन से रोजाना दो वक्त का भोजन नहीं जुटा पाते थे। यह सब शुष्क था, और हम सिर्फ खरीफ में धान पैदा करते थे। लेकिन अब यह जमीन साल भर हरी रहती है।” अब वह धान, फूलगोभी, बैगन, लोबिया, चना और न जाने क्या-क्या उगाते हैं।

“पिछले साल हमें प्रधानमंत्री कृषि सिचाई योजना (PMKSY) से सब्सिडी पर, यह ड्रिप और स्प्रिंकलर मिला और इससे फसलों की सिंचाई बहुत आसान हो गई है।” यह देखते हुए, कि उन्होंने कृषि प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भागीदारी के समय सुझाए गए तरीकों का जोरदार विरोध किया था, अजीत हेम्ब्रम द्वारा दी गई यह मान्यता एक बड़ा बदलाव थी।

अंजलि और अजीत हेम्ब्रम पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले के बाघमुंडी प्रशासनिक ब्लॉक के हतिनादा गाँव में रहने वाले संथाल आदिवासी हैं। बाघमुंडी ब्लॉक जंगल महल क्षेत्र में पड़ता है, जो पश्चिम बंगाल के सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में से एक है।

इस क्षेत्र में आदिवासी आबादी ज्यादा है, जिनमें संथाल जनजाति प्रमुख है। इसकी पठारी संरचना और बारहमासी नालों के न होने के कारण, 800-1,300 मिमी की अच्छी बारिश के बावजूद क्षेत्र में पानी की कमी बनी रहती है।

जेंडर और आजीविका

एक विकास संगठन, प्रोफेशनल असिस्टेंस फॉर डेवलपमेंट एक्शन (PRADAN), 10 से ज्यादा सालों से इस क्षेत्र में काम कर रहा है। स्व-सहायता समूहों (एसएचजी) में महिलाओं को संगठित करना, बदलाव लाने की दिशा में पहला कदम था।

हालांकि महिलाएं खेती की सभी गतिविधियों में शामिल होती हैं, लेकिन आजीविका से जुड़े किसी भी फैसले में उनकी राय का स्थान नहीं होता। इस कारण पुरुषों पर आर्थिक निर्भरता रहती है। एक किसान कौन है, इस सवाल पर, अपने स्वयं के प्रयासों की अनदेखी करते हुए महिलाएँ कहती हैं – “वो, जो जमीन जोतता है और उसका मालिक है।” क्योंकि महिलाएँ भूमि की जुताई नहीं करती और जमीन की मालिक नहीं हैं, इसलिए इस परिभाषा के अनुसार उन्हें किसान नहीं माना जाता है।

इसलिए आजीविका को बढ़ावा देते समय, हमने महिलाओं की राय सुनिश्चित करने के लिए तीन पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया – महिलाओं की स्वयं को किसान के रूप में देखने में मदद करना; घर की खपत और बाजार के लिए अधिक पैदावार और फसल-विविधता सुनिश्चित करने के लिए कृषि पद्धतियों पर उनके कौशल और तकनीकी जानकारी विकसित करना; और परिश्रम को कम कठोर बनाने के लिए कृषि उपकरणों का इस्तेमाल।

महिला संसाधन व्यक्ति

हमने महिला समुदाय संसाधन व्यक्तियों (सीआरपी) की पहचान की और फसल प्रबंधन, मिट्टी (मृदा) प्रबंधन, कृषि उपकरणों का उपयोग और ट्रेलीस, नर्सरी, पॉली हाउस जैसी आधुनिक कृषि पद्धतियों, आदि के बारे में प्रशिक्षण और हैंड-होल्डिंग सहायता प्रदान की।

प्रशिक्षण एवं प्रदर्शन यात्राओं से महिला किसानों को आधुनिक कृषि पद्धतियों के बारे में जानने में मदद मिली (फोटो – PRADAN के सौजन्य से)

जब महिलाओं ने अपने विचार रखे, तो शुरू में पुरुषों ने विरोध किया। उन्होंने महिला सीआरपी पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी की। लेकिन कुछ ऐसे थे, जो महिला सीआरपी के सुझावों से सहमत हुए और उन्हें थोड़ी जमीन में लागू करने की कोशिश की।

जब उन्हें अंतर दिखाई दिया, तो धीरे-धीरे पूरे गांव ने उन पद्धतियों का पालन करना शुरू कर दिया। समुदाय द्वारा कृषि पद्धतियों में बदलाव से, घरेलू खपत के लिए उत्पादन में वृद्धि हुई और बाजार में बेचने लायक नकदी फसलों से आय में वृद्धि हुई।

पश्चिम बंगाल सरकार के उषारुमुखी कार्यक्रम और विश्व बैंक त्वरित विकास सूक्ष्म सिंचाई परियोजना (WBADMIP) द्वारा बाघमुंडी ब्लॉक में जल-संचयन संरचनाओं के निर्माण के लिए धन प्राप्त हुआ। पानी की पहुंच के साथ, किसान अब रबी और ज़ैद के मौसम में खेती कर रहे हैं, और उसी जमीन से ज्यादा आय अर्जित कर रहे हैं।

उद्यम के रूप में खेती

जहां फसल उत्पादन और निर्णय लेने में महिला किसानों की भागीदारी में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, वहीं अब भी लाभ प्राप्त करने की चुनौती बनी हुई है। आमतौर पर पुरुष इनपुट्स खरीदते हैं और उपज स्थानीय थोक मंडी में बेचते हैं।

इसके दो अर्थ हैं; महिलाओं की भागीदारी खेत के कामों तक सीमित है और उपज की आय पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है। और एक बार माल स्थानीय बाजार में पहुँच जाने के बाद, किसान की मोल भाव करने की शक्ति सीमित हो जाती है।

माथा ग्राम पंचायत के धनुडीह गाँव में एक दिलचस्प चर्चा हुई। यह गांव पुरुलिया के स्थानीय बाजार बलरामपुर मंडी से 17 किमी दूर है। किसानों ने बताया कि जब वे मंडी में जाते हैं, तो व्यापारी सब्जियों (इस मामले में टमाटर) को तीन श्रेणियों में बाँट देते हैं।

उन्हें श्रेणी-1 के लिए बाजार के बराबर दाम मिलते हैं, और श्रेणी-2 के लिए आधे दाम। श्रेणी-3 की सब्जियाँ या तो अस्वीकार कर दी जाती हैं या मामूली दर पर खरीदी जाती हैं। फिर उन्हीं टमाटरों को मिला लिया जाता है और धनबाद, टाटानगर या कोलकाता की बड़ी मंडियों में ले जाया जाता है।

किसानों के लिए केवल एक ही मंडी उपलब्ध है और मोल भाव की कोई गुंजाइश नहीं है। एक बाजार सर्वेक्षण करते समय हमने पाया, कि किसानों से सस्ते दाम पर खरीदी गई उपज को व्यापारी 5 से 8 रुपये प्रति किलोग्राम के लाभ के साथ बेचते हैं।

सामूहीकरण

किसानों में इकठ्ठा होने और बाजार-उन्मुख खेती के बारे में जानने की जरूरत महसूस हो रही थी। जुलाई, 2020 में, वॉलमार्ट फाउंडेशन के लाइवलीहुड्स एन्हांसमेंट थ्रू मार्केट एक्सेस एंड वीमेन एम्पावरमेंट (LEAP) परियोजना के सहयोग से, हमने माथा और अयोध्या हिल्स पंचायतों को चिन्हित किया, और किसानों को ‘किसान उत्पादक संगठनों’ (एफपीओ) में संगठित किया।

वहां मजबूत महिला समूह हैं और प्रत्येक सदस्य को 15,000 रुपये तक का ऋण देने के लिए स्वयं सहायता समूहों के पास काफी पूंजी है। संगठनों को ‘आनंदधारा परियोजना’ (पश्चिम बंगाल राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन) से जोड़ा गया है।

उत्पादक समूहों के रूप में एकत्रित होकर, महिला किसान अपनी उपज के लिए बेहतर कीमत मांगने में सक्षम हैं (फोटो – PRADAN के सौजन्य से)

लगभग 90% एसएचजी को 15,000 रुपये का रिवॉल्विंग फंड और आनंदधारा प्रोजेक्ट से 50,000 रुपये प्रति एसएचजी का सामुदायिक निवेश फंड मिला है। अयोध्या हिल्स और माथा की इन एसएचजी के बैंक खाते हैं, जिनमें 150,000 रुपये की कैश-क्रेडिट सीमा है।

गांवों को चिन्हित करने के बाद, किसानों का सामूहिक खेती और समन्वित खेती के लिए अभिमुखीकरण किया गया। प्रत्येक गाँव में ‘विजेता’ फसलों (भोगौलिक स्थिति और बाज़ार के आधार पर इलाके की सबसे उपयुक्त फ़सल) का चयन, सामान्य नर्सरी, गुणवत्तापूर्ण उत्पादन, छँटाई और ग्रेडिंग, उपज का भंडारण और बिक्री, आदि पर केंद्रित समूह चर्चाएँ आयोजित की गईं।

क्योंकि महिलाओं को पहले से ही SHG में मिलकर काम करने का अनुभव है, और उन्होंने सामूहिकता के गुण देखे हैं, इसलिए वे आसानी से उत्पादक समूहों का हिस्सा बनने के लिए सहमत हो गईं। छह महीने के समय में, 37 गांवों की 600 महिला किसानों का एफपीओ और बाजार-उन्मुख सामूहिक खेती पर उन्मुखीकरण हुआ।

उन्होंने और 2,100 महिला किसानों को जुटा लिया और 15 उत्पादक समूहों का गठन किया। उत्पादक समूहों ने अपनी भूमि के एक तिहाई हिस्से में बाजार-उन्मुख खेती शुरू करने और बाकी में खाद्य फसलों और मौसमी सब्जियों को जारी रखने का फैसला किया है।

लाभ प्राप्त करना

अयोध्या हिल्स पंचायत के हतिनादा गांव की सरस्वती कहती हैं – “हमारे निर्माता समूह के सदस्यों ने टमाटर (क्षेत्र की विजेता फसल) को घर से ही 10.5 रुपये प्रति किलोग्राम पर बेचा, जबकि जो लोग इसका हिस्सा नहीं थे, उन्होंने अपनी उपज 7-8 रुपये किलो में बेची।”

प्रत्येक उत्पादक समूह एक कृषि-उद्यमी सहयोग प्रदान करता है, जो एक स्थानीय युवा है और बाजार से संबंधित जानकारी प्रदान करता है, विभिन्न मंडियों में दामों पर नज़र रखता है, मूल्य के मोल भाव में मदद करता है और सदस्यों को अन्य कृषि सेवाएं प्रदान करता है।

किसान, पारबती मुर्मू कहती हैं – ‘हमने इस साल पॉली हाउस में 120,000 टमाटर पौध लगाई। 40 किसानों ने 13.3 एकड़ भूमि में गुणवत्तापूर्ण पौध की रोपाई की। इससे उपज की गुणवत्ता सुनिश्चित हुई है। क्योंकि किसान बारी-बारी से काम कर रहे थे, इसलिए काफी समय बच गया।

पॉली-हाउस का उपयोग अन्य फसलों की खेती के लिए भी किया जाता है। नम आँखों से पारबती मुर्मू कहती हैं – “जब विक्रेता ने मुझे मेरी टमाटर की फसल के लिए 15,750 रुपये दिए, तो मैं बहुत खुश हुई। यह पहली बार था, जब मेरी आमदनी सीधे मेरे हाथ में आई। मैं अब एक किसान हूं।”

महिला किसानों को उत्पादक समूहों के रूप में एकजुट हुए अभी सिर्फ छह महीने हुए हैं और बदलाव अभी से जाहिर है। हालांकि अभी एक लंबा रास्ता तय करना है, लेकिन बाघमुंडी की महिला किसान धीरे-धीरे, लगातार उद्यमी किसान बनने की यात्रा में मिलकर अपना आधार तैयार कर रही हैं।

अलोपी चतुर्वेदी और सुमन गेयन PRADAN से सम्बंधित हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।

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