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तटीय विकास

ग्रामीण प्रस्तावित मरीना के खिलाफ क्यों हैं

पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए, सरकार का अंतरराष्ट्रीय स्तर का एक मरीना (छोटी जल विहार बंदरगाह) विकसित करने का प्रस्ताव है। तटीय गाँवों के निवासी, अपनी आजीविका और पर्यावरण पर प्रभाव की आशंका से इसका विरोध कर रहे हैं

मरीना विकसित करने के सरकार के प्रस्ताव को स्थानीय ग्रामीणों के विरोध का सामना करना पड़ा है, जिन्हें आजीविका के नुकसान का डर है (छायाकार - डब्ल्यू. स्पंदना)

जब मैंगलोर निवासी स्पंदना, अप्रैल के पहले सप्ताह में पादुकेरे समुद्र तट पर चल रही थी, तो मरीना परियोजना से जुड़े किसी भी व्यक्ति के प्रवेश पर प्रतिबंधित लगाने वाले एक साइन-बोर्ड ने उसका स्वागत किया। यह सफेद रेत वाला समुद्र तट, बचपन से ही उनका एक पसंदीदा स्थान था, क्योंकि वह उडुपी में पली-बढ़ी थीं, जो पादुकेरे से गाड़ी द्वारा मात्र 30 मिनट की दूरी पर है।

जिज्ञासावश, उन्होंने और जानने की कोशिश की। वह कहती हैं – “वहां के ग्रामीण किसी से बात करने को तैयार नहीं हैं। उन्हें हर किसी पर शक है और उन्होंने मेरी कार की नंबर प्लेट की तस्वीरें लेने की भी कोशिश की।” कर्नाटक के इस हिस्से में, एक मरीना बनाने की योजना दो-एक साल से चल रही है। और अब कई महीनों से, इस समुद्र तट पर कई विरोध प्रदर्शन हुए हैं।

पर्यटन और रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए, इस तट को विकसित करने के बारे में चर्चा 2018 में शुरू हुई। रिपोर्टों के अनुसार, पादुकेरे, मालपे में प्रस्तावित मरीना 3.69 किमी के क्षेत्र में, समुंद्र के अंदर 1.66 से 2 किलोमीटर तक बनाया जा सकता है, जिसके लिए ‘ब्रेकवाटर’ यानि पानी के जोरदार बहाव को रोकने के लिए दीवारनुमा संरचना की मदद ली जाएगी।

शांतिनगर और मत्तु कोपलू के बीच एक बड़ा क्षेत्र इसके अंतर्गत लाने का प्रस्ताव है। मरीना बड़े क्रूज जहाजों को खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ नौकाओं और पाल-नौकाओं सेलबोटों के लिए होगी। प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, इस परियोजना की प्रस्तावित लागत 800 करोड़ रुपये है।

सरकार की पर्यटन योजनाएं

उडुपी के उपायुक्त जी. जगदीश ने बताया – “वर्तमान में भारत की एकमात्र चालू मरीना कोच्चि में है, बाकी अरब सागर और दक्षिण एशियाई देशों के बीच चलने वाली 4,000 से ज्यादा नौकाओं को लंगर डालने के लिए मध्यवर्ती  सुविधाएं कम हैं।” सरकार इसे पर्यटन, खासतौर से अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन बढ़ाने के अवसर के रूप में देखती है, जिससे रोजगार में वृद्धि होगी।

पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सरकार, अंतरराष्ट्रीय स्तर का एक मरीना विकसित करना चाहती है (छायाकार – डब्ल्यू. स्पंदना)

इस क्षेत्र के बहुत से छोटे, प्राकृतिक द्वीप, इसे विभिन्न नौकाओं और पालनौकाओं को खड़ी करने के लिए और भी ज्यादा उपयुक्त बनाते हैं। क्योंकि भारत में अंतरराष्ट्रीय स्तर का कोई दूसरा मरीना नहीं है, तटीय विकास प्राधिकरण द्वारा पादुकेरे में बनाया जाने वाला मरीना, अत्याधुनिक बनाने की योजना है।

जगदीश के अनुसार, सरकार लोगों को आश्वस्त करने की भरपूर कोशिश कर रही है, कि यदि पर्यावरण के लिए हानिकारक है, तो इस परियोजना को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा और मरीना का निर्माण पर्यावरण मानदंडों का उल्लंघन किए बिना किया जाएगा। अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए भोजनालय, क्लब, बुर्ज और एक सैरगाह बनाने का प्रस्ताव है।

मछुआरों का डर

फिर ग्रामीण उस मरीना के खिलाफ क्यों हैं, जो पादुकेरे समुद्र तट को अमीर आदमी की जन्नत में बदल देगा? मछुआरा समुदायों के रूप में, उनकी सबसे बड़ी चिंता उनकी आजीविका पर प्रभाव पड़ने का खतरा है। मालपे मछुआरा संघ के अध्यक्ष, एक मछुआरे कृष्ण सुवर्णा का कहना था – “हम मछुआरे केवल अपनी मछली पकड़ने के काम में नुकसान होने की संभावना के कारण इसका विरोध कर रहे हैं।”

मालपे क्षेत्र के बहुत से मछुआरे, मछली पकड़ने की उस तकनीक का उपयोग करते हैं, जिसमें तट के नजदीक जाल डालना शामिल है। छोटी नावों के साथ एक मरीना की मौजूदगी, उनके शोर और गतिविधियों के कारण, कम गहरे पानी की मछली के प्राकृतिक आवास को नुकसान होना निश्चित है। वे समुद्र में और पीछे चली जाएंगी, जिससे मछुआरों के लिए मछली पकड़ना मुश्किल हो जाएगा।

आजीविका के नुकसान के डर से, तटीय गांवों के निवासी मरीना का विरोध कर रहे हैं, और उन्होंने मरीना में काम करने वाले मजदूरों को प्रवेश न करने की चेतावनी देने वाले बोर्ड लगाए हैं (छायाकार – डब्ल्यू. स्पंदना)

मछुआरा समुदाय के एक नेता, राम कंचन ने कहा – “हम विकास के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन हम ऐसी किसी भी चीज़ के खिलाफ हैं, जिसमें इस क्षेत्र और हमारे जीवन को नुकसान पहुंचाने की सम्भावना हो।” सरकार जिन पहलुओं को पर्यटन और अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने वाले समझती है, वे ठीक वही हैं, जिनसे ग्रामीणों को डर है। 

ग्रामीण नहीं चाहते कि एक मरीना के कारण उनकी संस्कृति और सामाजिक गतिविधियां बदलें या नष्ट हो जाएं। फिर भी एक अन्य मछुआरे का कहना था कि उन्हें डर है कि ऐसी परियोजनाओं के कारण, उन्हें अपने पूर्वजों की भूमि, अपना गृहनगर छोड़ने पर मजबूर किया जा सकता है।

पर्यावरणीय प्रभाव

ऐसे बहुत से शोध-पत्र हैं, जो जलमार्गों में मानवजनित बदलावों के समुद्रों की मौजूदा गुणवत्ता, जैव विविधता और जल, वायु और व्यापक रूप से पर्यावरण की गुणवत्ता पर प्रभाव को दर्शाते हैं। एक समुद्री शोधकर्ता, जो अपना नाम गुप्त रखना चाहते थे, का कहना था कि आजीविका के नुकसान के अलावा, मरीना समुद्री-प्रजातियों को अत्यधिक प्रभावित करेगा, यहां तक ​​कि कुछ स्थानिक प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा भी होगा।

सेंट्रल मरीन फिशरीज रिसर्च इंस्टीट्यूट (CMFRI) द्वारा किए गए शोध के अनुसार, इस क्षेत्र में 28 प्रकार के फाइटोप्लांकटन, समुद्री शैवाल की 28 प्रजातियां, 25 प्रकार के समुद्री एनीमोन, 390 मछली की प्रजातियां और 234 मोल्लुसक (घोंगे, सीप, जैसी विभिन्न) प्रजातियां हैं।

एक मरीना, जो एक गोदी या बेसिन है, न केवल नौकाओं को खड़ी करने की सुविधा प्रदान करता है, बल्कि यह नावों के लिए ईंधन, पानी, बिजली और पम्प द्वारा मल निकालने जैसी सुविधाएं भी प्रदान करता है। दुनिया भर में, मनोरंजन नौका विहार में वृद्धि के परिणामस्वरूप मरीना या नौका बांधने के स्थान की मांग में वृद्धि हुई है।

लहरों के थपेड़ों से सुरक्षा के लिए बनाई दीवार (ब्रेकवाटर) के निर्माण के साथ-साथ, मरीना के अन्य हिस्सों में समुद्री वनस्पति में भारी कमी आती है, जो वास्तव में युवा मछलियों का भोजन होती हैं। छोटी, उथले-पानी की मछलियों की मात्रा, साथ ही लवणता और जल सम्बन्धी स्थितियों में बदलाव से, पक्षियों की कुछ प्रजातियों का भोजन कम हो जाता है।

नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज (NCBS) की एक पूर्व शोधकर्ता, समुद्री जीवविज्ञानी, लवीना ने कहा – “मालपे एक मैंग्रोव से समृद्ध क्षेत्र है, जिसमें विशाल मैंग्रोव वन हैं। एक मरीना या बंदरगाह का निर्माण, निश्चित रूप से मैंग्रोव को नुकसान पहुंचाएगा और इस कारण मछली और झींगों के प्रजनन के स्थानों को नुकसान पहुंचाएगा।

शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है, कि मछली के प्रजनन स्थल का काम करने वाले मैंग्रोव वनों को नुकसान पहुंचेगा (छायाकार – डब्ल्यू. स्पंदना)

चिंता-भरी आवाज में, उन्होंने डॉल्फ़िन पर संभावित प्रभाव के बारे में भी बात की। “पानी में नावों के चलने से बहुत ज्यादा आवागमन और ध्वनि प्रदूषण होता है – जिससे डॉल्फ़िन की संचार प्रणाली में बाधा पड़ती है, और यह उनके नियमित व्यवहार को बाधित करता है।”

अनिश्चित संभावनाएं

हालांकि मरीना अभी भी प्रस्ताव के चरण में है, सेंट्रल वाटर एंड पावर रिसर्च स्टेशन (CWPRS), पुणे ने परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए, एक व्यवहार्यता (संभावना संबंधी) रिपोर्ट तैयार करने पर सहमति जताई है।

एक मरीना के पर्यावरण पर प्रभाव आमतौर पर बहुत जल्दी दिखाई नहीं देते; नुकसान दिखने में लंबा समय लग सकता है। क्षेत्र के स्थानीय लोगों को डर है, कि इस पर्यावरण और जैव विविधता को नुकसान के अलावा, सरकार के आश्वासन मात्र उन्हें अभी के लिए शांत रखने के लिए हैं।

बाद में, यह संभव है कि ग्रामीणों को स्वयं अपने समुद्र तटों तक पहुंच की अनुमति नहीं दी जाए। देश भर में गोवा, मुंबई और कोलकाता जैसी कई तटीय बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की रोशनी में, यह एक महत्वपूर्ण बातचीत है।

राशी गोयल गोवा स्थित एक पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।

यह मूल रूप से ‘मोंगाबे इंडिया’ में प्रकाशित हुआ था।

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