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आयु-अनुरूप शिक्षा

पूरक शिक्षण से छात्रों के समग्र विकास में मदद मिलती है

सरकारी स्कूलों में छात्रों के उम्र के अनुरूप अध्ययन पर लक्षित, गतिविधि-आधारित कार्यक्रम से व्यापक प्रगति सुनिश्चित करने के अलावा, उनके शैक्षणिक प्रदर्शन में भी सुधार हुआ है।

महामारी के कारण छात्रों के छोटे समूहों के लिए आयोजित पूरक कार्यक्रमों से उनके सीखने के परिणाम में सुधार हुआ है (छायाकार - हितेश मालवीय)

ज्यादातर सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में एक आम बात जो देखी गई, वह है उम्र के अनुरूप शिक्षा में भारी अंतर। इसका मतलब यह नहीं है कि सभी सरकारी स्कूलों में यह चुनौती है। कुछ बहुत अच्छे हैं और उनसे उत्कृष्ट छात्र निकलते हैं।

गुजरात के सुरेंद्रनगर जिले की सायला तालुक में, गैर-सरकारी विकास संगठन, आगा खान ग्रामीण सहायता कार्यक्रम (भारत) [एकेआरएसपी (आई)] वर्ष 2013 से प्राथमिक शिक्षा में सुधार की दिशा में काम कर रहा है।

वर्तमान में AKRSP(I) बिना किसी क्रम के चुने गए 32 स्कूलों के साथ काम करता है। स्कूलों का चयन करते समय, कुछ स्कूलों से कार्यक्रम के लिए आए विशेष अनुरोधों को ध्यान में रखा जाता है। मुख्य रूप से कक्षा III से VIII के छात्रों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। वर्तमान में 32 गांवों के 2,600 से ज्यादा छात्रों का नामांकन किया गया है।

उम्र के अनुरूप सीखने पर लक्षित गतिविधि-आधारित कार्यक्रम, छात्रों को अपने नियमित पाठ्यक्रम में पाठ आसानी से सीखने में मदद करता है। इसे इस तरह से डिजाइन किया गया है कि यह छात्रों के समग्र विकास की ओर जाए। समीक्षाओं से पता चलता है कि कार्यक्रम ने छात्रों को स्कूल में बेहतर प्रदर्शन करने में मदद की है।

पूरक कार्यक्रम

अध्ययन संवर्धन कार्यक्रम (Learning Enrichment Program) के अंतर्गत तीसरी से पांचवीं तक के छात्र गणित और भाषा (यहां गुजराती) सीखते हैं। अध्ययन सन्दर्भ केंद्र (Learning Resource Centre) में कक्षा VI से VIII तक के छात्र भाषा, गणित और विज्ञान सीखते हैं। कार्यक्रमों की समयसारिणी इस तरह से तय की जाती है कि यह स्कूल के नियमित समय को बाधित न करे।

विभिन्न दानकर्ता कार्यक्रम को धन देते हैं, जैसे मौजूदा कार्यक्रम के लिए ‘शेल प्राइवेट लिमिटेड’ ने धन उपलब्ध कराया है। गांव के शिक्षित युवा, जिन्हें बालमित्र (अर्थात् बच्चे का मित्र) का नाम दिया गया है, इस कार्यक्रम को चलाते हैं। प्रत्येक बालमित्र दो गांवों का प्रभारी होता है, जहां वह लगभग 100 छात्रों के लिए जिम्मेदार होता है। शैक्षणिक वर्ष के समानांतर चलने वाला यह कार्यक्रम, छात्रों के सीखने में वृद्धि करता है।

जो बच्चे कार्यक्रम का लाभ ले सकेंगे, उनकी पहचान एक टेस्ट द्वारा की जाती है। परिणामों पता चलता है किन छात्रों को सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। ये वो हैं, जिन्हें कार्यक्रम में नामांकित किया जाता है। बालमित्र उनकी सीखने की क्षमता में सुधार करने के लिए उनके साथ काम करते हैं। छात्रों की जरूरत के अनुसार बालमित्र उन्हें समूहों में या व्यक्तिगत रूप से पढ़ाते हैं।

समग्र शिक्षा

शिक्षण की पारंपरिक पद्धति की कमियों को समझते हुए, यहां पूरी तरह से गतिविधि आधारित सीखने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। रंगमिति (rangometry), संख्या-हार, फ़्लैश कार्ड, चित्र कार्ड, वाक्य-घड़ी, आदि शिक्षण-अध्ययन सामग्री (TLMs) से सिद्धांतों को पढ़ाया जाता है।

महामारी के दौरान शिक्षण-अध्ययन को संभालने में आसानी के लिए, सामग्री प्रदान की गई थी (छायाकार – भरत मालेकिया)

कार्यक्रम का एक अन्य पहलू पुस्तकालय मॉडल है। इसका उद्देश्य कक्षा III से कक्षा VIII तक के छात्रों को ज्यादा पढ़ने के लिए प्रेरित करना और उनमें पढ़ने की आदत डालना है। इससे उन्हें भाषा की समझ विकसित करने और सुसंगत वाक्य बनाने में मदद मिलती है।

यह स्कूलों की नियमित पुस्तकालय कक्षाओं से भी अलग है, क्योंकि यहां कठपुतली प्रदर्शन, रोल-प्ले, भाषण और दूसरी गतिविधियां होती हैं। इन गतिविधियों से छात्रों को न केवल भरपूर ज्ञान प्राप्त करने में मदद मिलती है, बल्कि पब्लिक में बोलने का आत्मविश्वास भी हासिल होता है। पूरा कार्यक्रम छात्रों के समग्र विकास के लिए तैयार किया गया है।

महामारी के दौरान शिक्षा

महामारी से पहले, गांव के स्कूल या पंचायत कक्ष में एक कक्षा कार्यक्रम के स्थान के रूप में काम करती थी। चार्टों, पोस्टरों, हस्त-कला कार्यों से सजी कक्षाओं में पढ़ाई के लिए अच्छा माहौल बनता है। कहानी की किताबें भी इस का हिस्सा हैं।

महामारी के कारण नियमित कक्षाएं चलाना संभव नहीं था। सभी छात्रों के साथ साझी जगह पर कक्षाएं चलाने की बजाय, COVID-19 संबंधी सभी सावधानियों का पालन करते हुए, गली-वार कक्षाएं लगाई गईं। बालमित्रों ने यह सुनिश्चित किया कि गली-वार कक्षाओं में भी 12 से अधिक छात्र न हों।

महामारी के कारण कक्षा-आधारित शिक्षण में संशोधन करना पड़ा। छात्रों को छोटे समूहों में पढ़ाया गया (छायाकार – भरत मालेकिया)

विशेष शिक्षण-सामग्री का उपयोग किया गया, ताकि छात्र उनका स्वयं इस्तेमाल कर सकें। क्योंकि महामारी के समय आम शिक्षण-सामग्री का उपयोग आसानी से नहीं किया जा सकता था, इसलिए मौजूदा सामग्री के छोटे रूप के साथ-साथ, नए ‘स्वयं-करो’ किट इस्तेमाल किए गए। छात्र नई संशोधित सामग्री घर ले जा सकते थे और जरूरी होने पर घर पर काम पूरा कर सकते हैं।

सीखने को मज़ेदार बनाने का दूसरा तरीका टैबलेट है। इनके माध्यम से, छात्र गति, रंगों और आकारों को परिप्रेक्ष्य में रख सकते हैं। वे अब दौड़कर कार्यक्रम के स्थान पर पहुंचते हैं, ताकि कक्षा शुरू होने से पहले वे टैबलेट का उपयोग कर सकें। छात्रों की याददाश्त में बहुत बड़ा बदलाव होता है। अब वे चीजों को आसानी से समझते हैं और सिद्धांतों को पहले से बेहतर याद रखते हैं।

स्कूल प्रबंधन समितियां

छात्रों की पढ़ाई के अलावा, कार्यक्रम स्कूल प्रबंधन समितियों (एसएमसी) पर केंद्रित है। एसएमसी में 13 सदस्य होते हैं, जो एक स्कूल के संचालन में मदद करते हैं। इसके सदस्यों का ग्राम सभा दो साल के लिए चुनाव करती है।

एसएमसी सदस्यों की जिम्मेदारियों में स्कूलों को छात्रों की अनियमितता जैसे मुद्दों को हल करने में मदद करना शामिल है। कार्यक्रम के हिस्से के रूप में, AKRSP(I) ने एसएमसी सदस्यों के लिए उनकी भूमिकाओं और जिम्मेदारियों के अलावा, ‘शिक्षा का अधिकार’ नीति से अवगत कराने के लिए, एक प्रशिक्षण आयोजित किया।

AKRSP(I) उन्हें मॉडल स्कूलों के प्रदर्शन दौरे पर ले गया, ताकि एसएमसी सदस्य सहयोगात्मक काम का अवलोकन कर सकें। प्रशिक्षण के बाद सदस्य अपने स्कूल के काम में ज्यादा हिस्सा लेते हैं। कई गांवों में, उन्होंने छात्रों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित की है। माता-पिता को समझाकर, एसएमसी ने सुनिश्चित किया कि छात्र अपने ऑनलाइन पाठ प्राप्त करें।

प्रभाव

कार्यक्रम के शुरू और अंत में परीक्षण में मिले अंकों के अंतर से इसका प्रभाव देखने को मिला। कक्षा III से V के लिए शिक्षण संवर्धन कार्यक्रम में, सभी 720 नामांकित छात्रों ने भाषा और गणित में डी ग्रेड प्राप्त किया। कार्यक्रम के अंत में, 71% ग्रेड बी तक और 14% ग्रेड ए तक पहुँच चुके थे।

इस साल कार्यक्रम के शुरू में छठी से आठवीं कक्षा के छात्रों (640) का कोई टेस्ट नहीं हुआ। इसकी बजाय, बालमित्रों ने उन छात्रों को नामांकित किया, जो उनके अध्यापकों के मूल्यांकन के अनुसार ग्रेड सी या डी में थे। वर्ष के अंत तक, विज्ञान में 56% छात्र ग्रेड बी और 36% ग्रेड ए तक पहुँच गए थे।

इस कार्यक्रम का हिस्सा बनने वाले स्कूलों के शिक्षक और प्रिंसिपल खुश हैं। वे छात्रों के सीखने के स्तर, उनके आत्मविश्वास और कक्षा में बातचीत के स्तर में सुधार देखते हैं। एसएमसी, स्कूलों और अभिभावकों ने इस कार्यक्रम को महामारी के दौरान सहायक पाया, क्योंकि इसने सुनिश्चित किया कि बच्चे अपनी शिक्षा जारी रखें।

देबंजना पॉल विकास-अध्ययन में स्नातकोत्तर हैं । वह AKRSP(I) से जुड़ी हैं। विचार व्यक्तिगत हैं। ईमेल-debanjana.paul@akdn.org

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